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Sunday, November 14, 2010

बालदिवस पर कुछ बातें और गीत

बालदिवस पर कुछ बातें कुछ गीत

बाल दिवस यानि बच्‍चों का दिन, बच्‍चों की आजादी का दिन...लेकिन अपने देश के करोडों बच्‍चों में से कितने बच्‍चे सचमुच बालदिवस उस रूप में मना पाते हैं जिसकी कल्‍पा इस दिन के जनक चाचा नेहरू ने की थी.....

बालदिवस पर आधारित एक पॉडकास्‍ट बच्‍चों के लिये भी और उनके अभिभावकों के लिये भी जिसमें शामिल हैं कुछ बातें और कुछ हिन्‍दी फिल्‍मों के गीत

पॉडकास्टं में शामिल गीत -
सुन सुन सुन मेरे नन्हें सुन
बच्चे मन के सच्चे – दो कलियां
आओ बच्चो‍ तुम्हें दिखाएं – जाग़ति
हम बच्चे‍ हिन्दुंस्तान के – शीर्षक गीत
नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी - बूट पॉलिश
हम भी अगर बच्चे होते - धूल का फूल
मैंने कहा फूलों से – मिली
आओ तुम्हें चांद – जख्मी
ओ नन्हे से फरिश्ते – आखिरी खत
नन्हा मुन्ना राही हूं - सन ऑफ इंडिया



पॉडकास्ट‍ में शामिल कुछ बातें -
पं0 नेहरू से मिलने एक व्यक्ति आये। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा- ''पंडित जी आप 70 साल के हो गये हैं लेकिन फिर भी हमेशा गुलाब की तरह तरोताजा दिखते हैं। जबकि मैं उम्र में आपसे छोटा होते हुए भी बूढ़ा दिखता हूँ।'' इस पर हँसते हुए नेहरू जी ने कहा- ''इसके पीछे तीन कारण हैं।'' उस व्यक्ति ने आश्चर्य-मिश्रित उत्सुकता से पूछा, वह क्या? नेहरू जी बोले- ''पहला कारण तो यह है कि मैं बच्चों को बहुत प्यार करता हूँ। उनके साथ खेलने की कोशिश करता हूँ, जिससे मुझे लगता है कि मैं भी उनके जैसा हूँ। दूसरा कि मैं प्रकृति प्रेमी हूँ और पेड़-पौधों, पक्षी, पहाड़, नदी, झरना, चाँद, सितारे सभी से मेरा एक अटूट रिश्ता है। मैं इनके साथ जीता हूँ और ये मुझे तरोताजा रखते हैं।''

यह दिन हमें सिखाता है कि हम न सिर्फ बच्चों के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव दिखाए बल्कि उनके कल्याण के लिए भी हरसंभव प्रयत्न करें। यानी बच्चों के सपनों को पूरा करने में मदद करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है।

1954 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से बच्चों के बीच समझ को बढ़ावा देने के लिए एक दिन अपनाने की सिफारिश की गई। इसी के तहत हर साल 20 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस मनाया जाता है। यह दिन अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और बच्चों के बीच समझ को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है। इस दिन को संयुक्त राष्ट्र के बच्चों के चार्टर के उद्देश्यों और आदर्शो के उत्साहवर्धन को समर्पित गतिविधियों के रूप में भी मनाया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) द्वारा किए गए सामाजिक कार्य का हिस्सा है। 20 नवंबर 1959 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा बाल अधिकारों की घोषणा को अपनाया गया। 20 नवंबर 1989 को कन्वेन्षन ऑन द राइट्स ऑफ द चाईल्ड (सीआरसी) अर्थात बाल अधिकारों के सम्मेलन में घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। इसी समय से 193 देशो के द्वारा इस घोषणा पत्र की पुष्टि की गई।

बाल भवन एक ऐसा संस्थान है, जिसका उदद्देश्‍य बच्चों को उनकी आयु, अभिवृत्तियों तथा क्षमताओं के अनुरूप उन्हें परस्पर मेलजोल बढ़ाने, प्रयोग करने, सृजन तथा प्रस्तुतीकरण के लिए विभिन्न गतिविधियां, अवसर व समान मंच प्रदान करना है। यह बच्चों के लिए तनाव रहित, बाधामुक्त व नवीकरण की संभावनाओं से युक्त वातावरण उपलब्ध कराता है। छत्तीसगढ में यह सुविधा बच्‍चों को उपलब्ध नहीं है।

हर वर्ष राष्ट्रपति भवन में देश भर से आए चुनिंदा बच्चों से भारत के राष्ट्रपति करते हैं। बाल दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति बच्चों का मनोबल बढ़ाते हैं और उन्हें उत्कृष्ठ कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चे भी इस मौके पर देश के प्रति अपने विश्वास और भविष्य में चुनौतियों का सामना करने की भावना को व्यक्त करते हैं। राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील का मानना है कि देश के विकास में बच्चों की शिक्षा तथा अनुशासन का अमूल्य योगदान होता है। उन्होंने देश के शिक्षकों एवं छात्रों की प्रशंसा करते हुए कहा था कि इनकी कड़ी मेहनत तथा संस्कृति ने दुनियाभर में देश का नाम रोशन किया है। देश के 11वें राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम भी देश के विकास के लिए बच्चों का विकास आवश्यक मानते हैं। उन्होंने पद पर रहते हुए तथा बाद में भी कई मौकों पर यह संदेश दिया है कि देश का विकास बच्चों के हाथों में ही है। उन्होंने कहा था कि आज के साथ समझौता करने पर ही हम देश के बच्चों के लिए बेहतर कल दे सकेंगे।

हमने अपने बच्चों को खेलते हुए देखना लगभग भुला दिया है। हम सब कुछ देखते हैं, बच्चों का खेल नहीं। आखिर ऐसा क्या है, इसे खेलने में जो हमें देखना चाहिए? बच्चे अपनी इस दुनिया को पूरी तरह भुलाकर खेलते हैं। अपनी एक अलग ही सुंदर दुनिया की रचना कर लेते हैं। वे जब खेलते हैं, उन्हें अपनी भूख-प्यास की कतई चिंता नहीं रहती। वे अपनी आड़ी-तिरछी लाइनों को बनाएँगे तो इतना मगन होकर कि वह उनके आनंद में बदल जाती है। उनमें कोई आकांक्षा नहीं, महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि बनाने का आनंद है। क्या हम मगन रहते हुए यह आनंद हासिल कर पा रहे हैं?

आज भी चाचा नेहरू के इस देश में लगभग 5 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। जो चाय की दुकानों पर नौकरों के रूप में, फैक्ट्रियों में मजदूरों के रूप में या फिर सड़कों पर भटकते भिखारी के रूप में नजर आ ही जाते हैं। इनमें से कुछेक ही बच्चे ऐसे हैं, जिनका उदाहरण देकर हमारी सरकार सीना ठोककर देश की प्रगति के दावे को सच होता बताती है। यही नहीं आज देश के लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चे शोषण का शिकार है। इनमें से अधिकांश बच्चे अपने रिश्तेदारों या मित्रों के यौन शोषण का शिकार है। अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञता व अज्ञानता के कारण ये बच्चे शोषण का शिकार होकर जाने-अनजाने कई अपराधों में लिप्त होकर अपने भविष्य को अंधकारमय कर रहे हैं।

सुविधासंपन्न बच्चे तो सब कुछ कर सकते हैं परंतु यदि सरकार देश के उन नौनिहालों के बारे में सोचे, जो गंदे नालों के किनारे कचरे के ढ़ेर में पड़े हैं या फुटपाथ की धूल में सने हैं। उन्हें न तो शिक्षा मिलती है और न ही आवास। सर्व शिक्षा के दावे पर दम भरने वाले भी इन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ नहीं पाते। पैसा कमाना इन बच्चों का शौक नहीं बल्कि मजबूरी है। अशिक्षा के अभाव में अपने अधिकारों से अनभिज्ञ ये बच्चे एक बंधुआ मजदूर की तरह अपने जीवन को काम में खपा देते हैं और इस तरह देश के नौनिहाल शिक्षा, अधिकार, जागरुकता व सुविधाओं के अभाव में अपने अशिक्षा व अनभिज्ञता के नाम पर अपने सपनों की बलि चढ़ा देता है।

यदि हमें 'बाल दिवस' मनाना है तो सबसे पहले हमें गरीबी व अशिक्षा के गर्त में फँसे बच्चों के जीवनस्तर को ऊँचा उठाना होगा तथा उनके अँधियारे जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैलाना होगा। यदि हम सभी केवल एक गरीब व अशिक्षित बच्चे की शिक्षा का बीड़ा उठाएँगे तो निसंदेह ही भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा तथा हम सही मायने में 'बाल दिवस' मनाने का हक पाएँगे।