Wednesday, August 31, 2011

बातों और गीतों की ज़बानी - बिंदि‍या


क्यूँ वो प्रिय आता पार नहीं, शशि के दर्पण में देख-देख मैंने सुलझाए तिमिर केश।
गूँथे चुन तारक पारिजात अवगुंजन कर दिल में अशेष,
क्यूं आज रिझाया उसको मेरा अभिनव सिंगार नहीं

यूँ तो ईश्वर ने नारी को सहज आकर्षण प्रदान किया है, फिर भी श्रृंगार और व्यवहार ये ऐसे गुण हैं जो उसके व्यक्तित्व और गरिमा में चार चांद लगा देते हैं। हमारे भरतीय संस्कृति में नारी के जिन सोलह सिंगारों का वर्णन किया गया है, उन्हीं में से एक है सुहागिनों के माथे की बिंदिया।

महिलाओं के माथे पर चमकती इस छोटे से सुहाग चिन्ह की कहानी भी उतनी लंबी और विस्तृत है, जितना नारी का खुद अपना व्यक्तित्व। भारत का कोई भी प्रदेश देखिये विवाहित स्त्रियों ने अपने सुहाग की प्रमुख निशानी के रुप में इसे सम्मान दिया है। वहीं आधुनिक परिवेश में अविवाहित युवतियाँ भी इसे अपने सौंदर्य वर्धन के लिए लगाती हैं। सौंदर्यवादी श्रृंगार रस के कवियों के कल्पना में तो बिंदिया का स्वरुप इतना ऊँचा है कि माथे पर लगी बिंदिया के सामने चांद और सूरज भी फीके और बेमानी लगते हैं। कवि बिहारी ने तो यहाँ तक कहा है कि किसी सँख्या में एक शून्य लगाने पर उस सँख्या का मान दस गुना बढ़ जाता है, लेकिन उनकी नायिका के माथे पर वही एक शून्य जब बिंदिया के रुप में लगता है तो उसकी सुंदरता हज़ार गुना बढ़ जाती है।
कहत सबै बेंदी दिये आंख दस गुनो होत,
पिय लिलार बेंदी दिये अगणित बढ़त उदोत ।
अब तो आप समझ ही गये होंगे इस नन्हीं सी बिंदिया का कमाल। सौंदर्य बोध की पर्याय यह बिंदिया प्रियतम की नींद उड़ाने का दम भी रखती है।

 

बिंदिया शीर्षक पर कई फिल्में भी बनी हैं और अनेक गीत भी लिखे गए हैं। इसके महत्व का अंदाज़ा तो इस बात से बखूबी लगाया जा सकता है, कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक यानि पूरे भारतवर्ष में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ की स्त्रियाँ बिंदिया के महत्व से अन्जान हों। ग्रामीण आदिवासी बाला हो या पाँच सितारा संस्कृति में बराबर धाक जमाने वाली आधुनिक नारी, सभी ने इसे बराबर सम्मान से अपने माथे पर लिया है और इसे लगाने में वो गौरव का अनुभव करती हैं। वैसे पहले कुमकुम की बिंदी लगाने का चलन ज़्यादा था पर फिर धीरे-धीरे काँच, और प्लास्टिक की बिंदियाँ भी बाज़ार में आई जिसके पीछे की ओर एक चिपकाने वाला पदार्थ जिसे राल कहा जाता है, लगाकर उसे माथे पर सजाया जाता था। और इसका नाम टिकुली पड़ा। समय बीतने के साथ-साथ बिंदियों का स्वरुप भी बदलता गया और आज वेलवेट की स्टीकरनुमा बिंदियाँ अधिक प्रचलित हैं, जिनको इस्तेमाल करना बहुत ही सरल और सस्ता भी है। बिंदिया की लोकप्रियता को देखते हुऐ सर्राफा बाज़ार भी इसकी ओर आकृष्ट हुआ; आज सोने- चाँदी और कीमती नगों से जड़ी सैकड़ों डिज़ायनों की बिंदियाँ स्वर्ण बाज़ार में उपलब्ध हैं, लेकिन सच यह भी है कि इस तरह की बिंदियों का प्रयोग रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर केवल शादी-ब्याह और मांगलिक अवसरों तक ही सीमि‍त है। खैर, बिंदिया चाहे कुमकुम की हो या सोने-चाँदी की काम तो सभी का एक है, रुप को निखारना।
घनानन्द नें कहा है -रावरी रुप की रीति अनूप, नयो नयो लागत , ज्यों ज्यों निहारिये।

पुराने समय में भारतीय बिंदिया का मूल स्वरुप गोलाकार हुआ करता था, वहीं अब फूल-पत्ते, पक्षी, जीव जन्तु, अस्त्र-श्स्त्र भी हज़ारों डिज़ायनों में ढलकर युवतियों के माथे की शोभा बढ़ा रहे हैं। कल तक सिंदूर की लाल बिंदी से अपने माथे को अलंकृत करने वाली भारतीय महिलायें आज बेशुमार रंगों और डिज़ायनों के बीच कभी-कभी तो इसके चयन में भी कठिनाई महसूस करती हैं। बिंदिया का लाल रंग और गोल आकार हमेशा चमकने वाले सूर्य से लिया गया है, सूर्य अनंत है और उसकी शक्ति शाश्वत। वहीं काली बिंदी या काला टीका लगाने के संदर्भ में ये मान्यता है कि काला रंग बुरी नज़र और बुरी आत्माओं को दूर भगाकर आत्मिक शांति प्रदान करने में समर्थ है। इसीलिए आपने देखा होगा कि हमारे घरों में छोटे बच्चों को तैयार करते समय माताऐं उनके माथे पर काला टीका लगा देती हैं, जिससे उन्हें किसी की बुरी नज़र न लगे। वैसे बिंदीया ने अपने स्वरुप के साथ साथ अपना स्थान भी बदला है, पहले बिंदी माथे के बीचों बीच में लगाई जाती थी, पर अब इसका स्थान दोनों भवों के बिल्कुल बीच में आ गया है। बाज़ार में बिकने वाली बिंदिया कम्पनी के नाम से नहीं बल्कि टेलीविज़न पर दिखाए जा रहे सीरीयल्स के मशहूर कलाकारों के नाम से ही बेची और खरीदी जा रही हैं।


प्राचीन जनश्रुतियों में भी हमें बिंदि‍या के चलन की चर्चा मिलती है। राजे-महाराजाओं के विवाह उनकी शूरवीरता के आधार पर होते थे। स्त्रियों को अपना वर स्वयं चुनने के लिए स्वयंवर समारोहों का आयोजन होता था, चुना गया वर अपनी कलाई या अंगूठे का रक्त निकाल कर वधु के माथे पर बिंदी लगाकर उसे अपनी पत्नी स्वीकार करता था। फिर इस रक्त की जगह सिंदूर ने ले ली और आज के इस फैशन परस्त युग में चेहरे के मेकअप में फिनिशिंग टच के रुप में प्रयुक्त होने लगी हैं कई वैरायटी की बिंदियाँ। इतना ही नहीं बिंदियों के विषय में वैज्ञानिक शोध भी हुए हैं जिसमें ये बताया गया है कि बिंदी या तिलक की सबसे बड़ा भूमिका मस्तिष्क के अग्र भाग को न केवल शांत और पुष्ट करना है बल्कि मस्तिष्क में अवस्थित सूक्ष्म तंतुओं के रक्त परिवहन को नियमित करते हुए मस्तिष्क में विद्यमान श्वेत पदार्थ को स्वस्थ करना भी हैं। कल तक जो बिंदिया उद्योग लघु श्रेणी में था वो आज विस्तृत कारोबार की श्रृंखला में आ खड़ा हुआ है। देश में जहाँ पर स्वतंत्रता के पहले इसके 20 कारखाने हुआ करते थे वहीं इसकी बढ़ती मांग ने इनकी सँख्या लगभग 25 से 30 हज़ार के पार कर दी है। हालांकि इनके उत्पादन के सही आँकड़े कहीं भी उपलब्ध नहीं है, पर इतना तय है कि बिंदिया उद्योग अब प्रतिष्ठित और बड़े औद्योगिक घरानों को पदार्पण के लिए आकर्षित कर रहा है। पूरे भारत में बिंदियों के उत्पादन के चैथाई हिस्से पर अकेले दिल्ली का कब्ज़ा है, एक सर्वेक्षण के मुताबिक पूरी दिल्ली में तकरीबन 3000 इकाईयाँ बिंदी बनाने के कारोबार से जुड़ी हुई हैं, जिनमें से 10 इकाईयों का सालाना टर्न ओवर 20 करोड़ से भी अधिक का है। विदेशों में भी इन भारतीय बिंदियों की भारी मांग है। अमेरिका में भारतीय महिलाओं के माथे पर दमकती बिंदिया को इन्डियन डॉट कहा जाता है, वैसे भी साधारण फेरी लगाने वाले से लेकर बड़े-बड़े शोरूम्स में उपलब्ध इस बिंदिया का नारी के जीवन से चोली दामन का साथ रहा है। भारतीय नारी के माथे पर सजी अपनी नूरानी आभा बिखेरती साधारण से साधारण सी बिंदिया में भी ऐसी असाधारण चमक है जिसमें नारी का संपूर्ण सौंदर्य चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा जैसी पंक्तियों को सही अर्थों में प्रकट करता है।

पॉडकास्‍ट में प्रयुक्‍त गीत ...... 
गीत- बिंदिया चमकेगी....................
गीत- मेरी बिंदिया तेरी निंदिया.......................
गीत- तेरी बिंदिया रे, रे आय हाय......................
गीत- कजरा लगा के बिंदिया सजा के.................
गीत- चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा...............

Tuesday, August 30, 2011

Bolte shabd 45


 आज के शब्‍द जोड़े  हैं -
      
'अहम्' और 'अहंकार'  'अवगुण' और 'दुर्गुण'



आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन

89. 'अहम्' और 'अहंकार'

90. 'अवगुण' और 'दुर्गुण'



Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Monday, August 29, 2011

बातों और गीतों की जु़बानी - राखी

पवित्रता और ममता के प्रतीक पर्व रक्षाबंधन पर फिल्मों से लिये गए गीतों के साथ ढेर सारी बातें राखी की......
रक्षाबंधन यानि भाई और बहन का अटूट बंधन, प्यारा सा बंधन.....फूलों से भी प्यारा तारों से भी प्यारा.....हज़ारों में एक होती है हर भाई के लिये उसकी बहना।
 


राखी के गीतों में गीतकारों की अलग अलग बातें कलमबद्ध हुई हैं और इन नग़मों को संगीतकारों ने ऐसी धुनें नवाज़ी हैं कि बरसों बाद भी हम इन गीतों को गुनगुनाने के लिये मजबूर हो जाते हैं। लगभग इन सभी गीतों में स्नेह के इस धागे को शब्दों में पिरोया गया है ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये सभी गीतकार बहन के पवित्र स्नेह से सराबोर साथ बिताए खट्टे-मीठे पलों को ताउम्र के लिये संजोए बैठे हैं। गीतकार हों या संगीतकार, गायक हों या साजिंदे सभी इन गीतों को गाते या बजाते वक्त बहन की छवि या भाई का दुलार अपनी कला से व्यक्त किया है।



अगर हम पुरानी फिल्मों की बात करें तो एक फिल्म बनी थी राखी जिसमें गीत था राखी धागों का त्योहार.....
एक और गीत था रंग बिरंगी राखी लेकर आई बहना.......अनपढ़ फिल्म का ये गीत राजा मेहदी अली खां साहब की कलम से उतरा था।
हिन्दुस्तानी फिल्मों के गौरवमयी इतिहास में लता जी का गाया राखी गीत ‘रखिया बंधवा ले..’ फिल्म लागी नहीं छूटै राम में दर्ज है। फिल्म ‘एक फूल एक धूल’ में सुमन कल्याणपुर का गाया हुआ एक गीत था राखी कहती है......इसी तरह गीता राय की खनकती आवाज में फिल्म ‘जीने दो’ में फिल्माया गया था जिसके बोल थे राखी का मौसम आया रे..और फिल्म काजल में साहिर का लिखा, रवि का संगीत बद्ध और आशा भोंसले का गाया गीत मेरे भैया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन... काफी प्रसिद्धहुआ।

सुनहरी यादें बन चुके चित्रपट के और भी बेशुमार गीत हैं। फिल्म ‘एक्टर’ में मीना कपूर का गाया हुआ एक गीत था    रखिया बंधवा ले मेरे भैया राखी आई। फिल्म ‘पिया मिलन’ में भी एक गीत था राखी का दिन आया  भैया जिसे ज़ोहरा जी ने अपनी आवाज़ दी थी। रफी साहब ने भी कुछ गीतों को अपनी जादुई आवाज़ से राखी के कुछ गीतों को नवाज़ा है जिनमें से राखी धागों का त्योहार काफी प्रसिद्ध हुआ।

भैया मेरे प्यारे राखी बंधवा ले और फि‍ल्म ‘नया कानून’ में मैं राखी की रखिया तू आन रे भी काफी लोकप्रिय हुए कजन्हें आशा जी की आवाज मिली थी लेकिन सर्वाधिक लोकप्रिय गीत फिल्म ‘छोटी बहन’ का था।

वास्तव में एक धागा वो भी कच्चा एक बहुत बड़े और सर्वाधिक पवित्र रिश्ते में तब्दील कर देता है। शायद इसी कच्चे धागे की इतनी बड़ी शक्ति ने भारतीय फिल्म के इतिहास के सम्मानित हर कलमकार को प्रेरित किया. आखिर ये धागा है कैसा.....ये राखी बंधन है कैसा?


पुरानी फिल्मों के साथ साथ नई फिल्मों में भी राखी गीतों की परंपरा बनी हुई है अंधा कनून, सत्यमेव जयते, प्यार का देवता, घर द्वार, स्वर्ग से सुंदर, वतन के रखवाले, इंसानियत के दुश्मन, डोली सजा के रखना, पागलपन जैसी अनेक फिल्में इसका उदाहरण हैं।

वैसे भी ये त्योहार किसी का नहीं भाई और बहन का होता है। दोनों के बीच दिनचर्या में प्रेम और स्नेह के अलावा हल्की फुल्की झड़प-तकरार भले ही होती रहती हो लेकिन वो सतही होती है। हृदय के किसी भी कोने से कोई भी भाई अपनी बहन का एक भी आंसू बर्दाष्त नहीं कर सकता, देख नहीं सकता।हमारी दुआ है कि किसी भी बहन की आंखों में गम का एक कतरा भी न आए। हर भाई की कलाई राखी से सजी रहे और वो बहन का रक्षा धर्म हमेशा निभाता रहे।


पॉडकास्‍ट में शामि‍ल गीत- 
रक्षाबंधन सबसे बड़ा त्‍योहार;;;;;
कहते हैं राखी के ये धागे......
फूलों का तारों का.......हरे रामा हरे कृष्णा
हम बहनांे के ....अनजाना
राखी धागों का त्योहार......राखी
रंग बिरंगी राखी लेकर आई बहना.......अनपढ़
मेरे भैया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन.... काजल
राखी धागों का त्योेहार
भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
ये राखी बंधन है कैसा
नहीं मैं नहीं देख सकता तुझे
ये राखी राखी प्यार मोहब्बत की लाई हूं मेरे भैया

Sunday, August 28, 2011

बोलते वि‍चार 12 - शि‍ष्टाचार

बोलते वि‍चार 12 
आलेख व स्‍वर - डॉ.आर;सी;महरोत्रा

शिष्टाचार या तहज़ीब की पहली शर्त है कि दूसरो का ध्यान रखा जाए- उनकी सुविधा और सम्मान को नज़रअंदाज़ न किया जाए।
एक साहब अपने घर पर जब किसी आगंतुक के साथ चाय पीते हैं, तो उस के साथ रखे गए कुल छह बिस्कुटों में से पाँच जल्दी-जल्दी स्वयं खा जाते हैं। एक अन्य साहब की पत्नी जब अपने ड्राइंग रुम में मेहमानों के लिए चाय लाती है, प्याला सबसे पहले अपने पति को देती है, मेहमानों को बाद में।  ऐसी बातों का सही और ग़लत होना जानने के लिए भारी शिक्षा या बुद्धिमानी की नहीं, सिर्फ सामान्य समझ की ज़रुरत है। यदि कोई व्यक्ति कुछ पढ़-लिख रहा हो, तो उसके सामने इस प्रकार खड़े होना कि उसकी ओर जाने वाला प्रकाश रुक जाए। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हमारे पास कहीं से किसी काम के लिए बिना पूर्व सूचना के आ जाए, तो उससे सीधे मुंहफट बन कर यह कह देना कि फिर कभी आ जाना प्रशंसनीय आचार नहीं है। यद्यपि यह सही है कि उसे भी सिर्फ ‘अपनी’ फु़रसत से और आपकी व्यस्तता-अव्यस्तता समझे बिना, अचानक नहीं आ धमकना चाहिए, पर हम यह तो सोच ही सकते हैं कि यदि उसने तहज़ीब नहीं दिखाई है, तो हम भी उसी की तरह न बन जाएँ। हमें उस से अच्छी तरह पेश इसलिए आना चाहिए कि हम ‘अपने घर पर ही’ मौजूद हैं, जबकि वह कहीं और से रास्ता नाप कर हमारे घर तक आया है। यदि हम उसे समय देने में उस समय बिल्कुल असमर्थ हों, तब भी हम उसे इतना शिष्टाचार तो दिखा ही सकते हैं कि दो मीठे बोल बोल कर उससे माफ़ी माँग लें।



किसी टिकिटघर की खिड़की पर आप खड़े हुए हों और बुकिंग क्लर्क अपने किसी निजी काम में या अपने साथियों के साथ गप्पों में मशगूल हो, तो आप ग़लत नहीं कहा करते हैं कि चँूकि वह आप की तरफ ध्यान नहीं दे रहा है, इसलिए उस का व्यवहार ठीक नहीं है।

आप ने किसी दुकानदार से साढ़े सात रु. का सामन लिया और उसे दस रु. का नोट दिया। अब पूरी संभावना है कि आपको पचास पैसे नहीं मिलेंगे। दुकानदार चेंज का सच्चा-झूठा बहाना बना कर आप से आठ रु. ही लेगा, सात नहीं। वह इस बात पर ध्यान देना ज़रुरी नहीं समझता कि जितना नुकसान पचास पैसे कम लेने में उसका होता, ठीक उतना ही नुक़सान पचास पैसे ज़्यादा लेकर आपका कर रहा है।

 दो निरीक्षक बिल्कुल एक ही ड्यूटी पा एक संस्था में दो अलग-अलग शहरों में भेजे गए। ड्यूटी शाम को पांच बजे तक थी। उनमें से एक निरीक्षक महोदय अपना टी.ए.- डी.ए. ले कर दो बजे की बस से ही वापस निकल भागने के लिए दूसरे से कहते हैं कि आप तो यहाँ हैं ही, मैं अगर जल्दी निकल जाऊँ तो मुझे सुविधा हो जाएगी। अब तहज़ीब चाहे कुछ भी कहे, उन्हें ड्यूटी चोर बनकर सिर्फ़ ‘अपनी’ सुविधा की पड़ी थी।

 यह एक आम बात है कि जब तक रेल के डिब्बें में मुसाफिर खुद नहीं घुस पाता है, तब तक वह कोई और होता है, लेकिन जब वह भीतर घुस चुकता है, तब कोई और हो जाता है। आप शयनयान में अपनी आरक्षित शयिका पर सफ़र कर रहे हैं। कोई अनाधिकृत सज्जन घुस कर आऐंगे और आप से कहेंगे-’ज़रा सी जगह दे दीजिए, मैं आधे घंटे में उतर जाऊँगा।’ इसी प्रकार दूसरे आऐंगे और कहेंगे, ’मैं बस दो स्टापों के बाद उतर जाऊँगा।’ आप को पूरी सुविधा भोगने का अधिकार है और आप को लंबी यात्रा करनी है, लेकिन सिर्फ़ अपनी सुविधा- और वह भी ग़लत अधिकार से - देखने वाले सज्जन आप को कष्ट दिए जा रहे हैं, जबकि उन्हें खड़े-खड़े ही जाना चाहिए, क्योकि वे ग़लत बोगी में चढ़े हैं, बिना आरक्षण के, और उन्हें आप की तुलना में थोड़ी-थोड़ी ही दूर जाना है। तहज़ीब के नाम पर टी.टी. भी आप का ध्यान नहीं रखेगा, क्योकि वह ‘अपना’ ध्यान रखने के लिए ‘किन्हीं और’ बातों का ध्यान रखता है। मान लिया कि आपको सफ़र करते-करते किसी आगामी स्टेशन के लिए टिकट बढ़वाना है, तो टी.टी. का सामान्य जवाब होगा- ‘स्टेशन पर पहुँच कर खिड़की से खरीद लीजिए न।’ यद्यपि उसकी ड्यूटी है और आपका अधिकार है, लेकिन उसे आप की भारी असुविधा दिखई नहीं देती, सिर्फ़ अपनी यह असुविधा दिखाई पड़ती है कि उसे क़लम चलानी पड़ेगी।

निष्कर्ष रुप मे कहा जा सकता है कि जिंदगी तो हम सभी लोग काट रहे हैं, लेकिन यदि तहज़ीब के साथ काटें, अर्थात दूसरों की सुविधा और सम्मान का ध्यान रखते हुए काटें तभी हम सभ्य होने का दावा कर सकते हैं।

Friday, August 26, 2011

audio spoken word

बोलते शब्‍द बोलते शब्‍द बोलते शब्‍द बोलते शब्‍द 

बोलते शब्‍द सीरीज हि‍न्‍दी के दो एक जैसे शब्‍दों के अंतर को ऑडि‍यो स्‍वरूप में प्रस्‍तुत करने की एक श्रृंखला है। ये शब्‍द जोड़े भाषावि‍द् डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा की 'मानक हि‍न्‍दी के शुद्ध प्रयोग' नामक पुस्‍तक के अंश हैं.......

बोलते शब्‍द 1 - आमंत्रण व नि‍मंत्रण और आचरण व चरि‍त्र
बोलते शब्‍द 9 - ग्रह व गृह और ग्रहण व प्राप्‍त 
बोलते शब्‍द 10 - गेंद व बल्‍ला और जूता व चप्‍पल
इस तरह के ९८ शब्दों के जोड़े इस ब्लॉग पर उपलब्ध हैं



बोलते वि‍चार

बोलते वि‍चार 10 - असंभव और संभव 
इस तरह के 67 विषयों पर ऑडियो इस ब्लॉग पर उपलब्ध हैं


बोलते शब्‍द 44


 आज के शब्‍द जोड़े  हैं -
      
'अरारोट' और 'डालडा'  'आज़ाद' और 'गुलाम'



आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन

87. 'अरारोट' और 'डालडा'



88. 'आज़ाद' और 'गुलाम'





Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Wednesday, August 24, 2011

बोलते वि‍चार 11 - दूसरों की मदद एक सीमा तक ही करें

Bolte Vichar 11

आलेख व स्‍वर - डॉ.रमेश चन्‍द्र महरोत्रा
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दूसरों की मदद करना या दूसरों के काम आना एक इनसानियत वाली बात कही जाती है, लेकिन ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ सूक्ति के अनुसार इस मामले में भी इनसानों को सावधान रहने की ज़रुरत है। किसी व्यक्ति की इतनी अधिक मदद करना सही नहीं है कि वह अपने पैरों पर कभी खड़ा न होकर सदा आप पर ही आश्रित बना रहे। किसी के लिए इतना ज़्यादा करना ग़लत है कि उस को आप से इतनी अधिक अपेक्षाएँ हो जाएँ कि वह आपके किए हुए को आगे के लिए भी अपना जन्मजात अधिकार समझने लगे। होता प्रायः यही है कि आप जितना अधिक करते हैं उस की आप से उतनी ही अधिक अपेक्षाएँ होने लगती हैं और बाद में यदि उसकी अपेक्षाओं में थोड़ा भी कम करते या कर पाते हैं, ता वह आप से नाराज़ हो जाता है। इसके विपरीत जिस की हम कम मदद करते है या बिल्कुल नहीं करते, स्वाभाविक है कि उसे हम से उम्मीद भी कम होती है और आगे चलकर उस के हम बुरे भी कम बनते हैं।जिस दरवाज़े पर भिखमंगों को कुछ नहीं मिला करता, उस तरफ़ वे जाना ही छोड़ देते हैं।

 

बच्चों की हर माँग को पूरा करते चले जाना भविष्य की दृष्टि से कोई सही कदम नहीं है। कहते हैं कि अधिक लाड़ से बच्चा सिर पर चढ़ता है; उस की ज़रुरत से ज़्यादा इच्छाऐं पूरी करने से उस की आदत खराब होती हैं। माँ यदि उसकी बढ़ती हुई मांग के अनुसार उसे सब-कुछ देती रहती है, तो एक दिन ऐसा ज़रुर आ जाता है, जब माँ की असमर्थता का ध्यान न रखते हुए बिगड़ा हुआ लड़का यह कह बैठता है कि उस की आदतें माँ ने ही बिगाड़ी हैं। माँ उसकी बुरी न बनती, यदि वह उसकी अपेक्षाओं को इतना अधिक न बढ़ाती। एक एम.ए. पास लड़की यह कहते हुए सुनी गई कि उस की बहुत ही अच्छी दीदी ने उसे पूरी तरह से बिगाड़ दिया, क्योंकि दीदी ने घर के किसी काम में उसे हाथ भी नहीं लगाने दिया। लड़की की शिकायत थी चूंकि उस का सारा काम दीदी ही कर देती थी, इसलिए वह फूहड़ रह गई।

परोपकार बहुत अच्छी चीज़ है, पर इतना परोपकार नहीं किया जाना चाहिए कि उस से खुद परोपकार करने वाला व्यक्ति एकदम निर्वस्त्र हो जाए और जिस पर परोपकार किया जा रहा है वह भस्मासुर बन जाए। भलाई करने के लिए कड़ाई भी ज़रुरी है। आदमी स्वयं अपना भला भी नहीं कर सकता, यदि वह अपने ऊपर भिन्न-भिन्न प्रकार के बंधन न लगाए।

दूसरों की मदद करने में एक पहलू और विचारणीय है। अपनी भलमनसाहत में आप जिसकी मदद करते हैं, यदि उस से बदले में कुछ चाहते हैं, तो आप को दुख मिलने की संभावना रहती है। प्रतिदान की अपेक्षा वाली ऐसी भलाई सौदेबाज़ी के समान हो जाती है, इसीलिए ‘‘नेकी कर दरिया में डाल’’ वाला सिद्धांत बहुत सुखकर माना गया है। बड़े नहीं आप बहुत बड़ें बने रहेंगे यदि आपने किसी पर अहसान के बदले में उस से कुछ नहीं चाहा। आप सत्कर्म कीजिए; यदि बदले में आप के प्रति सत्कर्म नहीं किया जा रहा है, तो आप यह समझ लीजिए कि यह ज़रुरी नहीं है कि जितने अच्छे आप हैं, दूसरा भी उतना ही अच्छा होगा। इस तथ्य को कोई नहीं नकार सकता कि कुछ लोग अयोग्य और बेईमान होते हैं, इसलिए आप को यह मान कर चलना होगा कि आप कितने भी परोपकारी हों- आप किसी प्रतिदान को पाने के कितने भी अधिकारी हों - आप के कुछ-न-कुछ काम हमेशा अधूरे पड़े रहेंगे। शिकायतें करने पर भी कुछ नहीं होगा, क्योंकि अयोग्यता और बेईमानी ऊँचे पदों पर बैठे लोगों में भी खूब मौजूद रहती है। दुनिया सरल नहीं काफी पेचीदी है। यदि सरल होती, तो हर आदमी परमार्थ करता और आप भी परमार्थ को पूरी पारंगतता के साथ निभा कर संसार में सतयुग ले आते। लेकिन दुनिया की पेचीदगी देखते हुए आप यह निर्णय करना कभी पसंद नहीं करेंगे कि आप अपना ‘जीवित शरीर’ नोच-नोच कर चील-कौवों को खिला दें। परमार्थ अवश्य करें- वह मानवता का परिचायक है- पर पात्रता देखकर। ऐसा न हो कि आप के द्वारा दी जा रही मदद के चक्कर में आप का शोषण शुरु हो जाए- आप लूट लिये जाऐं।वैसा हो जाने पर आप आगे परोपकार कैसे पाऐँगे? अपने को ठीक रखकर ही आप दूसरों का अच्छा इलाज कर सकते है।

production - libra media group
typing, blogging, recording - sangya, kapila

Monday, August 22, 2011

Bolte shabd 43


 आज के शब्‍द जोड़े  हैं -
      
'अनुसरण' और 'अनुकरण'  'अफीमची' और 'बावरची'



आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन

85. 'अनुसरण' और 'अनुकरण'




86. 'अफीमची' और 'बावरची'


Production - Libra Media Group, Bilaspur, India


Saturday, August 20, 2011

बोलते वि‍चार 10 - असंभव और संभव

Bolte Vichar 10

आलेख व स्‍वर - डॉ.रमेश चन्‍द्र महरोत्रा
कहते हैं संसार आशा पर टिका है। यह सही तो है; पर आशा किसी ऐसी बात की ही की जानी चाहिए जो असंभव न हो। यदि मनुष्य में इस से संबंधित समझ का अभाव रहता है, तो उसका बहुत सा समय और श्रम पूर्णतः असंभव वालों को भी पूरा करने की कोशिश में बेकार चला जाता है। नेपोलियन के लिए इस शब्द का अर्थ अत्यंत सीमित था। सच्चाई यह है कि जो लोग यह कहा करते हैं कि ‘असंभव’ कुछ नहीं होता, वे ज़रुरत से ज़्यादा आशावादी होते हैं और कई ग़लतफ़हमियों में जीते हैं। उत्साह बढ़ाने और हिम्मत न हारने के लिए उक्तियों का सहारा लेना उचित है, पर ऐसी उक्तियों का नहीं, जिन का खोखलापन आगे चल कर आदमी को इतना निराश कर दे कि वह कर्म पर से ही आस्था खो बैठै। हमें संभव और असंभव का भेद जान कर ही जि़दगी जीनी होगी। कीचड़ को धो-धो कर सफ़ेद कदापि नहीं बनाया जा सकता। कुत्ता कभी आदमी नहीं बन सकता, केवल रेत से पक्की दीवार कोई खड़ा नहीं कर सकता। मूर्ख व्यक्ति का हृदय कभी चेत नहीं सकता, भले ही उसे ब्रम्हा के समान गुरु मिल जाऐं। इसी प्रकार, आसमान से तारे तोड़ कर लाने का भी सही मतलब सभी समझते हैं। हमें गीता का उपदेश मान कर ‘कर्म’ अवश्य करना चाहिए, लेकिन दिशाहीन नहीं। हमें सफलता के लिए ‘प्रयत्न’ अवश्य करना चाहिए, लेकिन दिशाहीन और विवेकशून्य होकर नहीं। हमें कदम बढ़ाने के लिए ‘आशा’ अवश्य करनी चाहिए, लेकिन असंभाव्य बातों के लिए नहीं।

कोई उपकरण ख़राब हो जाने पर शुरु में बार-बार सुधारा जाता है, लेकिन एक समय ऐसा आ जाता है, जब उसके सुधरने की आशा नहीं रह जाती, और तब हम मोह त्याग कर उसे फेंक देते हैं। कोई भी खाद्य पदार्थ एक सीमा तक ही उपयोग में लाने के लायक रहता है, उस के बाद उसे खाना श्रेयस्कर नहीं रहता, इसलिए उस से स्वयं को बचाना आवश्यक हो जाता है। किसी पति-पत्नि के पारस्परिक संबंधों में इतनी अधिक विपरीतता आ जाती है कि कितने ही सत्प्रयास करने पर भी उन में समझौता संभव नहीं रह जाता; इसी कारण तलाक़ की व्यवस्था की गई है। यही बात किसी व्यक्ति के राक्षसी स्वभाव के बारे में है। राक्षस हर युग में रहे हैं और हर युग में रहेंगे। कहा जा सकता है कि उनके न सुधारे जा सकने में भी ‘असंभव’ शब्द की सार्थकता निहित है। इस से यह निष्कर्ष निकलता है कि जहां तक किसी के सुधार की सीमाएँ और हमारी क्षमताऐं हैं, वहाँ तक हम व्यक्ति में सुधार अवश्य करें, लेकिन उस के बाद यह मानते हुए कि संसार में यदि पुण्यात्माओं का अस्तित्व है, तो पापात्माऐं भी अवश्यंभावी हैं। गांधी जी के तीन बंदरों के समान सारी बुराइयों के प्रति अपनी आँखें, अपने कान, और अपना मुँह बंद कर के हम केवल अपना सुधार करें। सकारात्मकता की स्थापना के लिए हमें नकारत्मकता से आच्छादित इस सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि अच्छाईयों के साथ बुराईयों की भी सत्ता स्थाई है और कुछ बीमारियों का इलाज असंभव है। इसी प्रकार हमें भविष्य के लिए अपने पैर मज़बूत बनाए रखने के लिए इस तथ्य को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि यद्यपि आशा पर संसार टिका रहता है, तथापि आशा टूट जाने पर वह ढह नहीं जाता। इस विवेक से हम में संभावित निराशाओं की कड़वाहट को झेल पाने की शक्ति बढ़ेगी और हम अपने को बिना धोखे में रख यह दुहरा सकेंगे कि यदि आदमी के लिए आशान्वित होना ज़रुरी है, तो उस की जि़दगी में निराशाओं का आना भी ज़रूरी है और उन का सामना करने के लिए उसमें शक्ति का रहना भी ज़रूरी है।

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Thursday, August 18, 2011

Bolte Shabd 42


 आज के शब्‍द जोड़े  हैं -
      
'अनशन' और 'उपवास'  'अनि‍वार्य' और 'आवश्‍यक'



आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन

83. 'अनशन' और 'उपवास

84. 'अनि‍वार्य' और 'आवश्‍यक'

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Tuesday, August 16, 2011

बोलते वि‍चार 9 - न्‍याय का स्वरुप

Bolte Vichar 9

आलेख व स्‍वर - डॉ.रमेश चन्‍द्र महरोत्रा

‘न्याय’ का अर्थ ‘दोस्ती या रिश्तेदारी निभाना’ नहीं हुआ करता। न्यायालय का स्थान शासक से भी उपर उठा हुआ माना जाता है। उसे पूर्वाग्रहों से मुक्त कहा जाता है। उसका हृदय ‘निरपराध’ के लिए फूल के समान कोमल होता है इसलिए अपराध मुक्‍त साबित होने पर अभियुक्त को ‘बाइज़्जत’बरी किया जाता है। इसके विपरीत,न्यायाधीश का हृदय ‘अपराधी’ व्यक्ति के लिए वज्र के समान कठोर होता है, इसलिए अपराध सिद्ध होने पर वह आवश्यकतानुसार अभियुक्त को फांसी की सज़ा देने में नहीं हिचकता। तब वह यह नहीं सोचता कि अपराधी के बीवी-बच्चे कहां जाएंगे। सच्चे न्यायाधीश का चरित्र इतना अधिक सबल होता है कि उसके नैतिक साहस को न तो असामाजिक तत्व डिगा पाते हैं और न किसी की पहुंच और प्रभावों का उस पर असर पड़ पाता है। उसे ख़रीदा नहीं जा सकता।
न्यायाधीश के बारे में बात चलते समय कड़ी सज़ाओं की भी बात निश्चित रुप से उठा करती है। कुछ लोग कहते हैं कि कड़ी सज़ा अमानवीय होती है,पर वे यह विचार नहीं करते कि जिसे कड़ी सज़ा दी जानी पड़ती है, वह स्वयं किसी न किसी रुप में औरों के लिए कितना अमानवीय रहा होता है। साथ ही उस को दी जाने वाली सज़ा के उदाहरण वस्तुतः सैंकड़ों अन्य लागों को अमानवीय बनने से रोका जा सकता है। जीभ काट डालने की अमानवीय सज़ा सुन कर ही लाखों लोग ऐसा काम नहीं करेंगे कि उन की जीभ काटने की नौबत आए। यह बात अमानवीय कहां हुई? समूचे शरीर के हित के लिए किसी सड़ते हुए अंग को काट डालना शायद ही किसी के द्वारा अमानवीय कहा जाएगा। बिच्छू को तो उसके दिखते ही अधिकतर लोग भावी आशंका से उसे ज़िंदा नहीं छोड़ते।



               
                न्याय के साथ ‘माफ़ी’ का घनिष्ठ संबंध है। यदि कोई व्यक्ति माफ़ी मांगता है, तो इसका अर्थ यह है कि वह भूतकाल के लिए पश्चाताप भी करता है और भविष्य के लिए अपने में सुधार हेतु सन्नद्ध भी होता है। माफ़ी स्वयं में दंड है, इसलिए न्याय करने वाला व्यक्ति सच्ची माफ़ी मांगने वाले को उसके अपराध की मात्रा और सीमा पर विचार करते हुए एक अवसर देता है,तो उसके न्याय का पलड़ा डगमगाता हुआ नहीं कहा जाना चाहिए।

            जीवन में हर व्यक्ति के सामने कभी न्याय ‘पाने’ के और इसी न्याय ‘करने’ के अवसर आते हैं। उन अवसरों पर न्याय करने वाले की बुद्धि के स्तर की,और उसके चरित्र की पहचान हो जाती है। न्याय करते समय जो व्यक्ति ‘पंच परमेश्वर’वाली स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है,वह स्वार्थ और क्षुद्रता की सीमाओं में रह जाता है, ऐसे समय में ‘अपने-पराये’ को भूल कर निष्पक्ष फैसला देने वाला व्यक्ति ‘सामन्य’ से उठकर ‘महान’की श्रेणी में पहुंच जाता है।ऐसा व्यक्ति अपनी चमड़ी की नहीं, अपनी आत्मा की आवाज़ सुनता है, जो परमात्मा का अंश कही जाती है। यद्यपि ऐसे आदमी गिनती में बहुत कम हुआ करते हैं पर यदि वे भी न हों तो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ही हो कर रह जाए। अधिकतर मामलों में व्यक्ति विशेष का केवल गिने चुने लोगों के वर्ग में होना कोई ग़लत या आश्चर्य की बात नहीं है। डॉक्टर कम होते हैं, मरीज़ ज़्यादा। इंजीनियर कम होते हैं, मज़दूर ज़्यादा। समाज सुधारक और संत महात्मा भी गिने-चुने होते हैं,साधारण नागरिक और अनीति करने वाले प्राणी अनगिनत होते हैं। कभी-कभी रविन्द्रनाथ ठाकुर के ‘एकला चल’ के समान आप को बिल्कुल अकेला भी चलना पड़ सकता है। गरुड़ भेड़ों के समान नहीं,अकेले ही चलता है। आप यदि न्याय के नाम पर, आदर्श के नाम पर, नैतिकता के ताम पर, चरित्र के नाम पर बिल्कुल अकेले पड़ गए हों, तो भी अपने को अकेला मत समझिए, क्योंकि ‘इंसानियत’ आपके साथ है और ‘धर्म’ आप के साथ है। यों भी,अंधकार दूर करने के लिए आरंभ में केवल एक दीपक की आवश्यकता होती है,जो असंख्य दीपक जला सकता है। यदि आप में नैतिक साहस होगा,तो बिल्कुल अकेले रह जाने पर भी आप में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता होगी,तथा आइज़नहॉवर के अनुसार आप में ‘अड़ने और लड़ने की तत्परता’ होगी।

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Sunday, August 14, 2011

Bolte shabd 41


 आज के शब्‍द जोड़े  हैं -
      
'अधि‍कारी' और 'मंत्री'  'अनधि‍कार' और 'तदनुसार'


आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन


 

81. 'अधि‍कारी' और 'मंत्री' 




82. 'अनधि‍कार' और 'तदनुसार'






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Friday, August 12, 2011

बोलते वि‍चार 8 - बीती हुई बातों के भूत से छुटकारा

Bolte Vichar 8

आलेख व स्‍वर - डॉ.रमेश चन्‍द्र महरोत्रा

बीती हई दुखदाई बातें यदि मन पर भूत के समान छाई रहती हैं,तो मन के बोझ और मानसिक तनाव के अलावा हमें कुछ नहीं मिलता। साथ ही हमारा वह भूत हमारे वर्तमान और भविष्य को भी बिगाड़ने लगता है,क्योंकि हम उन सदा के लिए मृत बातों को सोच-सोच कर अपना बहुमूल्य समय भी बरबाद करते हैं और बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं पर भी आघात पहुँचाते रहते हैं।
‘जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है’ और ‘भगवान जो करता है, अच्छे के लिए ही करता है’ ऐसी उक्तियां हैं, जो हमें बीती हुई ख़राब बातों को भुलाने की प्रेरणा देती हैं। ख़राब बातें किस के जीवन में नहीं हुआ करतीं ? संसार के हर प्राणी के साथ अच्छी के साथ बुरी घटनाऐं भी ज़रूर घटती हैं। जब सभी के साथ कोई एक सी बात गुज़रनी आवश्‍यक होती है, तो उसे सह पाना दार्शनिक दृष्टि से बहुत कठिन नहीं होना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए नहीं बना है। पारस्परिक संघर्षों में किसी का अच्छा होता है, तो दूसरे का बुरा भी होना है। और जब बुरा हो चुका हो, तो आगे इस चिरंतन सच्चाई को याद करके कदम बढ़ाया जा सकता है, कि बीते हुए समय पर अपना कतई वश नहीं रहता है,क्योंकि बीते हुए समय के एक पल को भी कोई व्यक्ति नहीं पलट सकता।


‘बीती बात बिसारि और आगे की सुधि लेने’ का उपदेश मानव के हर दिन के चिरस्थाई सत्य की आधारशि‍ला पर विद्यमान प्रकाश-स्तंभ है। जब हम किसी बीती हुई अप्रिय बात पर अफसोस करते हैं, तो हमारे शुभचिंतक हमें ‘भगवान की यही इच्छा थी’, ‘होनी को कोई टाल नहीं सकता’, ’समय बड़ा बलवान है’,आदि बहुत कुछ कह कर तसल्ली देते हैं। वास्तव में उस समय अफ़सोस की दवा इस तसल्ली या संतोष से बढ़कर कुछ नहीं हुआ करती। बड़े से बड़ा आदमी भी इतना बड़ा और पूर्ण नहीं हो सकता है कि उसका कोई भी व्यक्ति बुरा न चाहे। ‘मुंड-मुंड की मति भिन्न होती है, सबके अपने-अपने स्वार्थ और प्रयत्न होते हैं; इसलिए निश्‍ि‍चत है कि कुछ लोग अपना अच्छा करने में सफल होंगे और कुछ लोगों का उससे संबंधित बुरा होकर रहेगा। जब यह भवितव्यता है,तो हम ‘बीत चुके’ को ‘यही होना था’ कह कर क्यों नहीं आगे बढ़ सकते? एक परिचित बुजुर्ग के सिर पर साँप गिरा और अपने रास्ते भाग गया। उन्ही के साथ एक बार यह घटना घटी कि रास्ता चलते उनसे सिर्फ एक कदम दूर एक छज्जा टूट कर गिर गया और वे बाल-बाल बच गए। दोनों अवसरों पर देखने-सुनने वाले प्रायः सभी लोगों ने चर्चाएँ कर डालीं कि यदि ऐसा होता तो,वैसा होता; साँप काट लेता तो, जि़दा नहीं बचते; छज्जा यदि एक सेकण्ड बाद गिरता तो उन का बहुत बुरा हाल होता; अकाल मृत्यु का कोई ठिकाना नहीं, न जाने कब आ जाए, वे तो तक़दीर के बहुत धनी निकले आदि। लेकिन बुजुर्ग सज्जन की अधिक उम्र का जैसे रहस्य ही यह था कि वे किसी भी अवसर पर विचलित नहीं होते थे। इन दोनों घटनाओं के समय भी उन्हें मानसिक तनाव छू तक नहीं गया था। उन्होंने दोनों बार एक सी बात कही -‘यही होना था।’उन का जीवन दर्शन हर अच्छी वुरी घटना पर ‘यही होना था’ और ‘बात तो बीत चुकी’ जैसे दो-तीन वाक्यों के सहारे उन्हें ‘परम सुखी’ और ‘सदा सुखी’ बनाए हुए है। हम खाने-पीने की चीज़ों में से अपनी पसंद की चीज़ें चुन कर खाते-पीते हैं। घटनाओं के क्रम में दुखदाई बातें हमें नापसंद होती हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उन्हें कड़वा या सड़ा गला मान कर हम उन्हे याद करना छोड़ दें और केवल मनपसंद बातें याद करें ? यह बात कठिन अवश्‍य है, लेकिन साधना के द्वारा असंभव नहीं है। और ऐसी साधना पूरी कर लेने वाले लोग किसी ख़ास हाड़-मांस के नहीं होते, वे हम लोगों के बीच के ही होते हैं।

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