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Sunday, September 9, 2012

बोलते विचार 67 व्यर्थ के झगड़े का इलाज


व्यर्थ के झगड़े का इलाज
आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



एक मोहल्ले की एक सड़क के बीच में एक कम पढ़ी-लिखी निम्न वर्गीय औरत एक साइकिल सवार को रोककरडाँट रही थी कि यदि तुम्हारी साइकिल से मेरे टककर लग जाती तो मेरे चोट लग जाती। साइकिल वाला जवाब दे रहा था कि न तो तुम्हारे चोट लगी है और न मेरी साइकिल ने तुम्हे छुआ ही है। मैं तो एक फुट की दूरी से  साइकिल निकाल रहा था। औरत बिगड़कर कहने लगी कि नहीं, तुम्हें साइकिल को और ज्यादा दूरी से  निकालना था, तुम्हारी गलती से मेरे चोट लग सकती थी। अगर लग जाती तो ? औरत के तेवर देखकर लग रहाथा कि वह साइकिल वाले को वहाँ से जल्दी नहीं जाने देगी और उसे खरी-खोटी सुनाती ही रहेगी।

साइकिल वाला जानता था कि साइकिल चलाने में उसने लेशमात्र भी गलती नहीं की थी, उलटे उसने औरत को सड़क के बीचों बीच चलते देखकर उससे बचने में विशेष सावधानी बरती थी। फिर भी उसने तत्काल गलती मान ली और बोला, ‘माँ जी ! मुझे एक बार माफ कर दो बस। आगे से ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।औरत ने अपनी जीत की खुशी में साइकिल वाले को मुक्त कर दिया।

जिंदगी में जाने कितने ऐसे अवसर आते हैं, जब हम दूसरे की नासमझी या गलती के कारण परेशानी में फँस जाते हैं। उपर्युक्त प्रकरण में यदि साइकिल वाला बहस को बढ़ाता रहता तो बात बिगड़ती ही चली जाती। उसका माफी माँगकर बखेड़े को जल्दी से निबट डालने का कदम बहुत समझदारी का था। ऐसा करने से उसकी जेब से कुछ नहीं गया और उसने एक नासमझ के क्रोध को जीत लिया। यदि वह अपनी सफाई दे देकर औरत के क्रोध को बढ़ाता जाता और अपने अहम् के नाम पर स्वयं भी अधिकाधिक क्रुद्ध होता जाता तो अपना ही नुकसान करता।

निष्कर्षतः किसी व्यर्थ के झगड़े का इलाज स्वयं को गलत न सिद्ध करने के लिए झगड़ा बढ़ाना नहीं है, उसका इलाज झगड़ा करने वाले के हाथ जोड़ लेना है।

Monday, September 3, 2012

बोलते विचार 66 वैयक्तिक लाभ और सामाजिक लाभ



बोलते विचार 66
वैयक्तिक लाभ और सामाजिक लाभ
 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



टी. वी. बिगड़ गया था। दुकानदार को फोन कर दिया, उसका आदमी घर आया और सुधारकर चला गया। पैसे लेकर रसीद  दे गया, सब बढि़या। एक बार वॉशिंग मशीन बिगड़ गई। उसके दुकानदार को भी उसी प्रकार फोन किया। उसने मना करते हुए कहा कि शिकायत लेकर स्वयं दुकान तक पहुँचना जरूरी है। पहले समझ में नहीं आया कि क्यों, पर वहाँ पहुँचने पर पता चला कि निर्धारित न्यूनतम राशि (दुकान के मैकेनिक के पारिश्रमि‍क और आने-जाने के खर्च को मिलाकर) जमा करना जरूरी है। ठीक है, राशि जमा कर दी। पर वहाँ यह कहे बिना नहीं रहा गया कि यह तो हम घर पर भी दे देते। इस पर वे बोले कि हम धोखा खा चुके हैं। एक संभ्रांत माने जाने वाले सज्जन ने घर बुलाया था। उनके यहाँ का काम करने के बाद जब बिल दिया तो वे बिगडने-झगड़ने लगे कि इतने ज़रा से काम के लिए इतने रूपए नहीं देंगे। तब से हमने नियम बना लिया कि बिना अग्रिम राशि  जमा कराए किसी के भी यहाँ नहीं जाएँगे।

आशय स्पष्ट है कि करे एक, भरें सब। समाज के कुछ अविवेकी और बदनीयत लोगों के कारण दूसरों को बिना बात के परेशानी-उठानी पड़ती है; एक के अविश्वसनीय व्यवहार के कारण अन्यों पर भी विश्वास करने में दुविधा होने लगती है। उपर्युक्त प्रकरण में दुकानदार को दोष देना फिजूल है, क्योंकि वह पहले से यह कभी नहीं जान पाएगा कि किस क्रेता का व्यवहार काम निकल जाने के बाद कैसा रहेगा। जो क्रेता गलत व्यवहार करता है, वह भविष्य के लिए दुकानदार विशेष से अपने ही संबंधों को बिगाड़ने वाला नहीं, दूसरों के लिए भी सामाजिक विद्रूपताएँ सामने खड़ी करने वाला अपराधी बन जाता है। वह केवल अपने छोटे लाभ के बारे में सोचता है, बड़े लाभ के बारे में नहीं सोच पाता। (यदि उन संभ्रांत क्रेता महोदय को मशीन की सुधरवाई महँगी ही लगती थी तो उन्हें मैकेनिक को अपने घर बुलाने के पहले दुकानदार से फोन पर ही रेट आदि की बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए थी।)

सदा याद रखी जाने वाली बात है कि थोड़े से पैसों की ‘अस्वीकृत बचत’ के वैयक्तिक लाभ की तुलना में अच्छे संबंधों के स्थायी सामाजिक लाभ का महत्व बहुत अधिक है।

Wednesday, August 29, 2012

Bolte Vichar 65 उधार लेने और देने से बचिए


बोलते विचार 65
उधार लेने और देने से बचिए

 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


प्रोफेसर साहब ने किसी-किसी  दुकान पर लिखे हुए वाक्य उधार प्रेम की  कैंची हैसे भारी शिक्षा ली थी। वे अपने प्रेम संबंध किसी से भी खराब नहीं करना चाहते थे, इसलिए वे न तो किसी से रूपए उधार लेते थे और न किसी को उधार देते थे दूसरी ओेर, वे उधार माँगने वाले छोटे-मोटे लोगों की थोड़े   बहुत रूपए-पैसों से मदद जरूर करते थे; लेकिन उनसे यह कहे हुए कि ये   रूपए वापस नहीं लूँगा इसका मुख्य कारण वे यह बताते थे कि ऐसा करने  से उनके मन पर यह बोझ और तनाव बिलकुल नहीं रह जाता था कि वह व्यक्ति ऋणस्वरूप लिये गए रूपए अपनी दी हुई ज़बान के  अनुसार समय पर या कभी वापस करेगा या नहीं। हमें ऐसी स्थिति कई बार झेलनी पड़ती है कि हमने तो अपनी शराफत में किसी जरूरतमंद को उसकी मदद के    नाम पर रूपए उधार तत्क्षण दे दिए कि वह बेचारा मुश्किल में है और दूसरेउसने रूपए माँगते समय हमसे दुनिया भर की इन्सानियत दिखाते हुए    यह  वचन भी भरा कि वह वे रूपए अमुक तिथि को जरूर वापस कर देगा    (यहाँ ब्याज के धंधे और लिखत- पढ़त की बात बिल्कुल नहीं है)। पर बाद में उन रूपयों का वापस मिलनादर्जनों बार टलती हुई अनिश्चिततामें बदलता  चला गया। प्रोफेसर साहब कहा करते थे कि इस प्रकार वह झूठा और बेईमान ऋणी हमें बेवकूफ बनाने में सफल हो जाता है। वे ऐसे मामलों में    अपना भारी सा अहसान ऋण मांगने वाले पर पटक कर शुरू में ही आगामी   दुविधा से मुक्त हो जाते थे। और यदि उनसे कोई यह पूछता कि वे रूपए तो क्या तो वे उत्तर देते -
रहिमन के नर मर चुके जे कहुँ माँगन नाहिं।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि।।

प्रोफेसर साहब का दृष्टिकोण मानवतावादी था; पर एक बात वे यह भी  कहते थे, जो रहीम ने नहीं कही थी, कि उधार लेकर वापस करने का वादा  करके उसे न चुकाने वाले कृतघ्न आदमी से एक भिखारी बहुत ज्यादा  ईमानदार होता है, क्योंकि यह विश्वासघात नहीं करता। केवल अपना  स्वाभिमान खोता है।


Production-libra media group, bilaspur,india

Friday, August 24, 2012

Bolte VIchar 64 नि‍र्णय के पूर्व


बोलते विचार 64

नि‍र्णय के पूर्व

 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 

महेश अपने भाई और पिता से जमीन-जायदाद संबंधी मुकदमा लड़ रहे थे, जिस सिलसिले में उन्हें अपने गाँव से अपनी बड़ी बहन के नगर कई बार जाना हुआ करता था। स्वाभाविक था कि वे बहन के यहाँ ठहर जाया करते थे। वहाँ वे जब-तब पिता के विरूद्ध विष उगलते रहते थे, जिसके प्रभाव से बहन पिता को इतना बुरा समझने लगी थी कि उसका मन उनके पास जाने का भी नहीं होता था। कुछ समय बाद जब एक बार उसका किसी विशेष अवसर पर गाँव जाना हुआ तो पिता ने उसे महेश के विरूद्ध बीसियों बातें बता डालीं, जिनका उस पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने महेश को आगे अपने घर पर ठहरने को क्या, आने तक को मना कर दिया।

यह सच्ची घटना सिर्फ यह सोचकर लिखी गई है कि किसी बात पर विश्वास केवल एक पक्ष को सुनकर करना उचित नहीं है - विशेषकर तब, जब बात में किसी व्यक्ति की बुराई-ही-बुराई हो। किसी की लगातार और हमेशा सिर्फ बुराई करने वाला व्यक्ति सामान्यतया ‘उस किसी’ के प्रति व्यक्तिगत विद्वेष से भरा हुआ होता है। जब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप पर आरोप लगाते जा रहे हों तब सच्चाई को खोज निकालना आसान नहीं होता। कचहरियों की जरूरत इसीलिए पड़ती है।

यदि आप किसी ऐसे मामले में दो पक्षों की बीच फँस जाएँ तो ‘किसी एक की’ अच्छी-से-अच्छी या बुरी-से-बुरी बात को भी सुनकर अपना निर्णय कभी न दें।

Wednesday, August 8, 2012

bolte vichar 63 संन्‍यास के बि‍ना भी.......


बोलते विचार 63

संन्‍यास के बि‍ना भी.......




 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


अच्छा बनने की चाह तो बहुतों में होती है और उसके लिए कोशिश भी बहुत से लोग करते हैं, पर अधि‍क-से-अधिक लोगों के लिए अच्छा बनकर दिखाने वाले व्यक्ति विरले ही होते हैं। इसका कारण यह है कि अच्छे-बुरे व्यक्ति हमारे अच्छा या बुरा होने का मूल्यांकन करते हैं, उनकी संख्या का भी कोई अंत नहीं है और अच्छाइयों तथा बुराइयों की भी कोई सीमा नहीं है।

अच्छा होने का संबंध मनुष्य के भीतर से भी है और बाहर से भी। बाहर की अपेक्षा भीतर से अच्छा होने का महत्व बहुत अधिक है ; क्योंकि स्वयं को केवल बाहर से अच्छा दिखाने वाले व्यक्ति ढोंगी होते हैं। उनकी पोल आगे-पीछे जरूर खुल जाती हैं। दूसरी ओर, केवल भीतर से अच्छे देर-सबेर दूसरों की नज़रों में अपनी अपेक्षित पहचान और इज्ज़त बना ही लेते हैं। यदि वे बाहर से भी अच्छे हुए, तब सोने में सुहागा है। उन अच्छों की सुगंध फैलते देर नहीं लगती।

उपर्युक्त उच्च अवस्था संत और संन्यासी बनकर प्राप्त करना अधिक सरल है, क्योंकि उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं होतीं और उन्हें सामाजिक आवश्यकताओं और प्रतिद्वंद्विताओं का सामना कम करना पड़ता है। अन्य लोगों को एक-दूसरे की इच्छाओं के पारस्परिक टकराव और बहुत व्यापी ईर्ष्‍या के कारण अच्छा बनने और बना रहने के लिये विकट संघर्ष करना पड़ता है। संतों और संन्यासियों के निजी जीवन की तुलना में सामान्य आदमियों के जीवन में विरोधों और शत्रुताओं के अवसर अधिक आते हैं। ऐसी स्थिति में भी जो व्यक्ति नैतिक मूल्यों पर खरे उतरते हैं, वे वस्तुतः संतों और संन्यासियों से भी अधिक बड़े हैं और मानव मात्र के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय हैं। 

गांधीजी ने संसार की कर्मस्थली से बिना अलग हुए यह सिद्ध कर दिखाया कि आदमी सांसारिक गतिविधियों से विरक्‍त न रहकर भी अधिकाधिक लोगों के लिए अधिकाधिक अच्छा बन सकता है। यही बात गांधीजी के पदचिन्हों पर ईमानदारी से चलने वालों पर लागू है। निष्कर्ष यह है कि अच्छा बनने के लिए संन्यास लेना जरूरी नहीं है, शादी न करना जरूरी नहीं है, चौबीसों घंटे भजन-प्रवचन करना-सुनना जरूरी नहीं है।

Production-Libra Media Group

Saturday, August 4, 2012

Bolte Vichar 62 गैर ज़िम्‍मेदार लोग और आप


बोलते विचार 62

गैर ज़िम्‍मेदार लोग और आप


आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


राजेन्द्र शनिवार को घर आए थे। कहकर गए कि सोमवार को आपकी सामग्री पहुँचा दूँगा। अपना फोन नंबर भी दे गए। जब बुधवार तक उनका कोई अता-पता नहीं रहा तो उनके नंबर पर फोन किया। उधर से आवाज आई कि वे हैं नहीं, जब आएँगे तब उन्हें बता देंगे, वे आपसे बात कर लेंगे। रात को उन्हें दूसरी बार फोन किया। जवाब मिला कि वे आकर चले गए, उन्हें बताना भूल गया कि आपका फोन आया था। अगली सुबह फिर फोन किया। उधर से सूचना मिली कि वे कभी-कभी ही यहाँ आते हैं। यह फोन नंबर उनका नहीं, हमारा है।

ट्रांसपोर्ट वाले गांगुली साहब के कार्यालय में कुछ ज़रूरी बात करने के इरादे से गया। उनके असिस्टेंट ने कहा कि वे अभी तो कुछ घंटों के लिए बाहर गए हुए हैं, जैसे ही वापस आएँगे, उन्हें बता दूँगा कि आप आए थे। उसने काम पूछा। बता दिया। बोले, ठीक है, कल इसी समय आ जाइए। अगले दिन गया। असिस्टेंड ने देखकर कहा कि अरे, मैं उन्हें कल बताना भूल गया, अभी बता देता हूँ।

सुधीर बाजार में मिला। बोला, शाम को आपके यहाँ आऊँगा। कुछ खास काम था। इंतजार रहा। नहीं आया। फोन पर भी नहीं बताया कि वह नहीं आ पाएगा। अगली सुबह उसके यहाँ आया। उसने अपनी ओर से पिछली शाम न आने की कोई चर्चा नहीं की। जब पूछा तो बताया कि, हाँ मुझे जिस काम से आना था, मैं पूरा नहीं कर पाया था।

एक परिचित के यहाँ का नौकर घर से कुछ छोटा-मोटा सामान बेचने के लिए ले गया था। बाद में वह जब-जब तब-तब झुककर बोला कि आज शाम को हिसाब करने के लिए जरूर पहुँच जाऊँगा। उसके बारे में अन्यों से जिक्र करने पर पता चला कि वह उन पैंसों को शराब आदि में फूँक चुका है।

इस प्रकार की बातें आपके साथ भी रोज घटित होती होंगी। लेकिन मन छोटा न करें। गलत आदमी हर युग में रहे हैं और हर युग में रहेंगे। यदि आप दूसरों से अपनी सुव्यवस्थित चाहतों के अनुरूप अपेक्षाएँ करेंगे तो अक्सर दुःख पायेंगे। दूसरों के विश्वासघात तक को सहन करने की ताकत रखिए। आगे बढि़ए। जो खो गया उसे भुलाते चलिए। शायर के शब्दों में, जिन्दगी का साथ निभाते चलिए। लोगों के निम्न स्तरीय व्यवहार पर अपना मानसिक संतुलन न खोइए। उन पर क्रोध करके अपनी हड्डियों को कमजो़र न बनाइए। पोप ने कहा है, ‘क्रोध करना दूसरों की गलती का अपने से प्रतिशोध लेना है।’

यदि आप अच्छे हैं तो अपने चारों ओर के लोगों के दायित्वहीन व्यवहार का प्रभाव स्वयं पर वैसे ही मत पड़ने दीजिए जैसे कमल अपने चारों ओर की कीचड़ का प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ने  देता।


Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Saturday, July 28, 2012

Bolte Vichar 61 अंतिम तिथि और अनुशासन


बोलते विचार 61

अंतिम तिथि और अनुशासन




आलेख- डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 
स्‍वर - संज्ञा टंडन




किसी भी तरह के आवेदन आदि की पहुँच के लिए ‘अंतिम तिथि’ क्यों दी जाती है ? आप हँस सकते हैं कि वह भी कोई सवाल है। क्योंकि इसका जवाब हर आदमी जानता है। ठीक है, अंतिम तिथि इसलिए दी जाती है कि उसके बाद प्राप्त होने वाले आवेदनों पर विचार नहीं किया जायेगा। इसी प्रकार यदि किसी प्रवेश या परीक्षा या नौकरी के लिए आवेदनकर्ता की उम्र दी गई तिथि तक निर्धारित किए गए वर्षों से अधिक नहीं होनी चाहिए तो उस तिथि तक उम्र एक दिन भी अधिक हो जाने से आवेदनकर्ता प्रवेश या परीक्षा या नौकरी के लिए अपात्र हो जाता है, यह भी ठीक है।

लेकिन कभी-कभी नासमझ लोग कुतर्क और जिद करने लगते हैं कि एक-दो दिनों से कोई फर्क नहीं पड़ता हे। वे गलत ही नहीं, भयंकर रूप से गलत होते हैं; क्योंकि वे अपने स्वार्थ के लिए समूची व्यवस्था में छेद करने वाले होते हैं।

ऐसे मामलों में नियम भंग करने की कोशिश करने वालों के लिए शिथिलता बरतना उनकी सड़ी आदत को बढ़ावा देना और नियम से चलने वालों के साथ अन्याय करना है। पक्षपात किसी के भी प्रति किस किया गया हो, वह पक्षपात करने वाले की कमजोरी और ओछापन ही होता है। यदि, मान लिया, आपने किसी एक को अंतिम तिथि के बाद दो दिनों की छूट दे दी, तो अंतिम तिथि उन दो दिनों के बाद की हो गई और दूसरे लोगों को उस तिथि के आगे के दो दिनों की छूट लेने का हक हो गया। यदि आप परीक्षा भवन में घुसने के लिए दस मिनट विलंब से आने वाले परीक्षार्थी को अनुमति दे देते हैं तो बारह मिनट विलंब से आने वाले को क्यों नहीं देंगे ? यदि आप निर्धारित अधिकतम वर्षों से चार दिन अधिक उम्र वाले व्यक्ति का आवेदन स्वीकार कर लेते हैं तो पाँच दिन अधिक उम्र वाले का आवेदन स्वीकार क्यों नहीं करेंगे ? यदि आप उसका भी आवेदन स्वीकार कर लेते हैं तो छह दिन अधिक उम्रवाले का आवेदन स्वीकार क्यों नहीं करेंगे? इस तरह छूट को बढ़ाने की सीमा के लिए कोई भी तर्क संगत नहीं हो सकता।

अंतिम तिथि और निर्धारित उम्र आदि से संबंधित शर्त पूरी न करने वाला व्यक्ति चाहे कितने भी सही-गलत कारण बताए, गलती सिर्फ उसकी होती है। उसकी व्यक्तिगत गलती के कारण आप उससे बहुत ज्यादा बड़ी सामाजिक गलती मत कीजिए। ऐसी स्थिति में सख्ती बरतना ही एक मात्र सही रास्ता है, वरना नियम और अनुशासन का कोई अर्थ नहीं है।

Production-Libra Media Group, Bilaspur, India

Wednesday, July 25, 2012

Bolte Vichar 60 आदमी सिर्फ आदमी है


बोलते विचार 60

आदमी सिर्फ आदमी आदमी है


आलेख व स्‍वर 

डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


बात दसों साल पहले की है। मेरी नानी पास के नगर से हमारे नगर, हमारे घर आई हुई थीं। उन्होंने कुछ पैसे देकर मुझे जलेबियाँ खरीदकर लाने के लिए बाजार भेजा। मेरे साथ मेरी छोटी बहन भी थी। हम सड़क पर पड़ने वाली पहली अच्छी हलवाई की दुकान से जलेबियाँ खरीदकर घर ले आए। वह दुकान मुसलमान की थी, जबकि हमारी नानी तरह-तरह के छुआछूत मानने वाली पुरातन पंथी हिन्दू थीं। नानी ने जलेबियाँ खूब प्रेम से खाई और उनकी तारीफ भी की। उस दिन की बात खत्म।

अगले दिन छोटी बहन ने बातों-बात में नानी को बता दिया कि हम जलेबियाँ एक मुसलमान हलवाई की दुकान से लाए थे। बस, फिर क्या था। नानी ने कोहराम मचा दिया। एक सौ एक बार कुल्ला किया। साथ ही उस दिन का उपवास किया और एक घंटा अतिरिक्त पूजा भी की।

जाहिर है कि यदि नानी को पता नहीं चलता कि जलेबियाँ कहाँ से खरीदी गई थीं, तब उनकी बुद्धि पूर्ववत् सही रहती। मतलब साफ है कि न तो जलेबियों में कोई खराबी थी और न हलवाई के मुसलमान होने में। जो कुछ था, नानी का अविवेक था।

हममें से अनेक लोग ऐसी न जाने कितनी फालतू बातों से बहककर सामाजिक प्रदूषण को बढ़ावा देते रहते हें। कमाल की बात यह है कि वही नानी जब दो दिन बाद अपने नगर वापस आईं तब ट्रेन के भीड़ भरे डिब्बे में चढ़ते समय जगह पाने के लिए जाति-धर्म से संबंधित सारी छुआछूत भूल गईं। उनके एक ओर मुसलिम महिला बैठी और दूसरी ओर दलित वर्ग की महिला।

सच्चाई यह है कि आदमी प्राकृतिक रूप से सिर्फ आदमी है। वह रंग-रूप और आकार- प्रकार के हिसाब से चाहे कितने ही वर्गों में बाँटा जा सके, उसकी मूल संरचना उसे पशु-पक्षियों से भिन्न सिर्फ ‘एक’ सिद्ध करती है। हम किसी नवजात शिशु को देखकर केवल यह बता सकते हैं कि वह ‘आदमी का’ बच्चा है, यह नहीं बता सकते कि वह किसी जाति और धर्म का बच्चा है। यदि हमें कोई न बताए तो यह बात उसके जीवनपर्यंत लागू रहेगी।

जब आदमी-आदमी के बीच जाति-धर्म का अंतर आरोपित अंतर है और इसके विपरीत मानवता सबके भीतर की मूल और स्थायी वस्तु है तो जाति-धर्म की तुलना में मानवता का स्थान अधिक ऊँचा माना जाना जरूरी है। यदि हमें किसी आदमी और उसकी चीजों से परहेज करना ही है तो उसके जाति-धर्म आदि को देखकर नहीं, उसके निजी ओछेपन और उसकी सड़ी-बुसी चीजों को देखकर करें।


प्रोडक्‍शन- लिब्रा मीडिया ग्रुप, बिलासपुर, भारत

Monday, July 23, 2012

Bolte Vichar 59 Agantuk ke prati vyavhar


बोलते विचार 59

आगन्‍तुक के प्रति व्‍यवहार




 आलेख व स्‍वर 

डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



श्रीमान् ‘क’ के घर जाकर आप जब-जब दरवाजे पर लगी घंटी बजाते हैं तब-तब भीतर से कोई व्यक्ति प्रायः बहुत जल्दी बाहर निकल आता है; जबकि श्रीमान् ‘ख’ के यहाँ जाकर घंटी बजाने पर भीतर से किसी को निकलने में हमेशा काफी समय लग जाता है। केवल इतनी सी बात से आप निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीमान् ‘क’ सुसंस्कृत आदमी है, जब श्रीमान् ‘ख’ कुल मिलाकर अच्छे आदमी नहीं है - ‘क’ में दूसरों के बारे में भी सोच पाने की क्षमता है, जबकि ‘ख’ केवल अपने बारे में सोचना जानते हैं

यदि ‘क’ घर के भीतर किसी जरूरी काम में व्यस्त होंगे, तब भी वे कुछ क्षणों के लिए बाहर आकर या किसी को भेज कर वस्तुस्थिति से अवगत करा देंगे। वे उसे प्रतीक्षा करने के लिए सम्मान पूर्वक बैठा तो सकते ही हैं, उसे उस समय समय न दे पाने की स्थिति में उससे क्षमा भी माँग सकते हैं। इसके विपरीत, ‘ख’ महोदय आगंतुक के देर तक बाहर सूखते रहने की भी परवाह नहीं करते और यह भी नहीं सोच पाते कि वे उसका अपमान कर रहे हैं

‘क’ अपने को ‘समाज का अंग’ मानते हुए यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आगंतुक कौन हैं और क्यों आया होगा। ‘ख’ अपने स्वयंवादी होने का सबूत देते हुए यह सोचते हैं कि बाहर जो भी आया होगा, अपनी ही गरज से आया होगा।

अपने घर के भीतर काम सबको रहते हैं। (आराम करना भी एक काम है) दूसरी ओर, यह भी सच है कि कभी-कभी घर की घंटी बहुत अनचाहे वक्त पर बज उठती है। पर हम इतनी सज्जनता तो दिखा ही सकते हैं दरवाजा खोलकर आगंतुक से सिर्फ एक मीठा बोल बोल दें। हम यह पक्का जान लें कि यदि हमारे घर का दरवाजा खुलने में हमेशा, अपपेक्षित देरी होती है तो समाज में हमारी छवि नीची होती है - लोग हमें स्वार्थी, अहंकारी, घरलिसा और न जाने क्या-क्या मानने लगते हैं। हो सकता है कि हममें से कोई रट्ठ इसका जवाब यह दे डाले कि भाड़ में जाएँ ऐसा मानने वाले,  हमें किसी से क्या लेना-देना। लेकिन इसके बदले हमें यह सुनने को मिल सकता है कि हमें भी समाज से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए और जंगल का रास्ता नाप लेना चाहिये।

हमारे परिचित एक साहब, बल्कि महासाहब, जब तक सेवारत रहे तब तक सबके साथ ऐसा ही रवैया अपनाते रहे, सेवानिवृत्त होने के बाद उनके यहाँ कोई कुत्ता भी मूतने नहीं जाता (अभद्र प्रयोग के लिए क्षमा करेंगे)

Production- Libra Media, Bilaspur, India

Friday, July 20, 2012

Bolte Vichar 58 Dusro ke samay ki izzat karein


बोलते विचार 58
दूसरों के समय की इज्जत करें




एक साहब ने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय ले रखा है। वे अपने घर में अकेले रहते हैं। उनके पैर किसी बीवी-बच्चों वाले के यहाँ रात को साढ़े नौ बजे के बाद भी जाने में नहीं ठिठकते। उस परिवार पर उनकी सरासर ज्यादती रहती है। परिवार वाले सज्जन उन साहब से यह कैसे कहें कि उन छड़े महोदय के पास बुद्धि नहीं है।

एक अन्य साहब का जब मन होता है, सुबह छह-साढ़े छह बजे ही हमारे घर आ धमकते हैं। वे अपने स्वास्थ्य-अभियान पर प्रातःकालीन भ्रमण के लिए निकलते हैं और वापसी में जब-तब हमारे यहाँ आ लदते हैं। वे कहते हैं कि वे हमारे दोस्त हैं। हम उनसे कैसे कहें कि वे शिष्टाचार का मतलब नहीं जानते।

उदाहृत लोग इस बात को बिलकुल नहीं सोच पाते कि दूसरों को भी निजी जीवन जीने का पूरा अधिकार है। यद्यपि एक ओर हमारे समाज में ‘अतिथि देवो भव’ स्वीकार किया जाता है, पर दूसरी ओर ‘बिन बुलाए मेहमान’ को असम्मान की दृष्टि से भी देखा जाता है। इसलिए जब कभी आपको किसी के यहाँ बिना पूर्व सूचना के जाना हो तब ऐसे समय मत जाइए जब वह अनुमानतः नित्यकर्म , भोजन, विश्राम आदि से निवृत्त न हुआ हो। इस संबंध में यह मानकर चलें कि दूसरे लोग आपका स्वागत तभी करेंगे जब आप उनकी सुविधा में सोचकर उसमें व्यवधान नहीं डालेंगे। यदि आप सिर्फ अपनी सुविधा देखकर किसी के यहाँ बार-बार ठँसना शुरू कर देते हैं, तब इस बात की संभावना बन जाती है कि वह व्यक्ति कुछ बार भले ही आपको बरदाश्त कर ले, पर बाद में अपने घर के अन्दर से कहलवाने लगेगा कि वह घर में नहीं है। यदि वह झूठ को बिलकुल पसंद करने वाला हुआ तो यह भी कहलवा सकता है कि आप उसके यहाँ गलत समय पर मत पहुँचा कीजिये। ऐसी नौबत आने पर कई बार मधुर संबंधों में भी गाँठ पड़ जाती है।

निष्कर्ष यह है कि यदि आपको दूसरों से अपनी इज्जत करवाते रहना है तो आप उनके समय की इज्जत करना न भूलें।




Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Monday, July 16, 2012

Bolte Vichar 57 Karm kerne wala Karmheen nahi

बोलते विचार 57

कर्म करने वाला ‘कर्महीन’ नहीं


 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



अपने कर्मों को हमें खेती के समान समझना चाहिए। अच्छी फसल पाने के लिए बहुत सी चीजें जरूरी है - अच्छी जमीन, अच्छा बीज, अच्छी खाद, अच्छा पानी, अच्छा परिश्रम, अच्छी सुरक्षा इत्यादि। अच्छा कर्म फल पाने के लिए भी बहुत से तत्व जरूरी हैं - अच्छी आत्मा, अच्छा ज्ञान, अच्छा समाज, अच्छा व्यवहार, अच्छी लगन, अच्छी नीयत इत्यादि।

यों माना जाता है कि अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है; पर कभी-कभी अच्छे-से-अच्छे कर्म करने के बाद भी अच्छा फल नहीं मिलता। खड़ी फसल अतिवृष्टि आदि से नष्ट हो जाती है। ऐसे में आदमी को स्वयं से बड़ी किसी सत्ता को स्वीकार करके अपने अहंकार के विसर्जन की सीख मिलती है। (वरना वह अपने को नियंता ही मान बैठेगा) 

 कर्म और भाग्य के छोरों को मिलाने वाला सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है - ‘कर्म करो और फल को भाग्य पर छोड़ दो।’ इससे कभी संभावित निराशा नहीं होगी।

कर्म अनिवार्य है। असली बनकर ‘दैव-दैव’’ पुकारने वाले पुरूष पुरूषार्थ हीन और कर्महीन कहे जाते हैं। कर्महीनों के विरूद्ध (और पुरूशार्थियों के पक्ष में) संत तुलसीदास ने लिखा है-
‘सकल पदारथ है जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’
सच है, पुरूषार्थी यदि ठान ले तो क्या नहीं पा सकता। निरंतर कर्मरत रहने वाल वयक्ति अपनी मंजिल पा ही लेते हैं। मदर टेरेसा ने क्या-क्या हासिल करके नहीं दिखा दिया। इसके विपरीत, जो केवल भाग्य की प्रतीक्षा करते हैं वे अपने दुर्भाग्य कोही रोते दीखते हैं।

‘अमरवाणी’ में पढ़ा था - ‘भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर, भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँधकर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है।

Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Sunday, July 15, 2012

Bolte Vichar 56 Kya chahiye Dikhava ya Asliyat

बोलते विचार 56

क्‍या चाहिये.... दि‍खावा या असलियत.....



  

आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


आदमी आज बाहर से कुछ तथा भीतर से कुछ और होता जा रहा है। ये स्थिति स्वयं के लिए काम चलाऊ भले ही हो, पर दूसरों के साथ धोखाधड़ी करने से कम नहीं है। ‘यथा नाम तथा गुण’ कहावत वाली बात मानो इतिहास के पन्नों में लुप्त हो चली है। कई बार ‘असलियत’ और ‘दिखावे’ में से ‘दिखावे’ की जीत हो जाती है। दिखावे की असलियत खोलने के लिए इस सच्चाई को मजाक में कहा जाता है कि बस एक कार्यक्रम राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का करवा लीजिए, संबंधित क्षेत्र की  सारी सड़कें चकाचक हो जायेंगी। ऐसे किसी अवसर पर दिखावे के लिये खुशहाली और सम्पन्नता का ऐसा नक्शा खींचा जाता है कि बड़े राजनेताओं को असलियत की हवा ही नहीं लग पाती। बचपन की कहानियों में सभी ने पढ़ा होगा कि राजा अपनी प्रजा के सुख-दुःख का जानने के लिए वेश बदलकर जगह-जगह जाया करता था, लेकिन छोटे नेता आज के राजाओं की आँखों के आगे असलियत खुलने देने में ही अपने अस्तित्व की रक्षा समझते हैं।

शादी-ब्याह के समय दिखावा कितने ही परिवारों को बेहद भारी पड़ता है। कई बार आदमी की हैसियत कुछ और होती है और करना उसे कुछ और पड़ता है। लड़की को दिखाने के मामले में भी प्रायः उसके रूप-गुण दिखावे की यही पद्धति अपनाई जाती है, जो कभी-कभी वास्तविकता से कोसों दूर होती है और तब जिसके कारण भविष्य में दम्पती के जीवन में स्थायी दरारें पड़ जाती है।

सफाई और सजावट जरूरी है, पर दिखावे मात्र के लिए नहीं। आदमी अपने लिए ही नहाता है, दूसरों के लिए नहीं। लेकिन दूसरी ओर, यदि भीतर गंदगी भरी हुई है तो बाहरी सफाई और सजावट का लाभ स्थायी नहीं हो सकता।

साधारण स्तर के अनेक नेताओं द्वारा झूठे आश्वासनों का दिया जाना वैसा ही है जैसा किसी नकली माल बेचनेवाले द्वारा भजन गा-गाकर उपदेश देना। ‘नेता’ शब्द के अर्थ में ह्रास इसीलिए हुआ है कि बहुत से नेता अपने को दिखाते कुछ और हैं, जबकि उनकी असलियत कुछ और होती है। वरना कुछ वर्ष पहले तक ‘नेता’ सचमुच सही नेतृत्व करने वाला हुआ करता था। ‘नेताजी’ शब्द कान में पड़ते ही आज भी सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति आँखों के सामने सम्मान के साथ स्थापित हो जाती है। वे जो भीतर से थे, वही बाहर से थे। उनके लिए असलियत और दिखावे में कोई अन्तर नहीं था।

अयोग्य होने पर विद्वान् होने का दिखावा करके, विपन्न होने पर सम्पन्नता का ढ़ोंग दिखाकर, बुड्ढ़ा होने पर जवान होने का छल-कपट करके और भ्रष्टाचारी होने पर ईमानदार होने का स्वाँग रचकर आदमी लंबी अवधि और स्थायित्व के पैमाने पर वस्तुतः स्वयं को ही धोखा देता है। बहुत मशहूर कहावत है कि आदमी कुछ लोगों को सब समय के लिये और सब लोगों को कुछ समय के लिए तो धोखा दे सकता है, पर सब लोगों को सब समय के लिए धोखा नहीं दे सकता। इस प्रकार हर दिखावे के पीछे छिपी असलियत एक-न-एक दिन सामने आकर पिछली सारी देनदारी को ब्याज सहित वसूल लेती है। दिखावों से दूर रहने वाला व्यक्ति हमेशा असलियत के समीप रहने के कारण ऐसी देनदारियों से सदा मुक्त रहता है।
कर्म करने वाला ‘कर्महीन’ नहीं

अपने कर्मों को हमें खेती के समान समझना चाहिए। अच्छी फसल पाने के लिए बहुत सी चीजें जरूरी है - अच्छी जमीन, अच्छा बीज, अच्छी खाद, अच्छा पानी, अच्छा परिश्रम, अच्छी सुरक्षा इत्यादि। अच्छा कर्मफल पाने के लिए भी बहुत से तत्व जरूरी हैं - अच्छी आत्मा, अच्छा ज्ञान, अच्छा समाज, अच्छा व्यवहार, अच्छी लगन, अच्छी नीयत इत्यादि।

यों माना जाता है कि अच्छे कार्मों का फल अच्छा होता है; पर कभी-कभी अच्छे-से-अच्छे कर्म करने के बाद भी अच्छा फल नहीं मिलता। खड़ी फसल अतिवृष्टि आदि से नष्ट हो जाती है। ऐसे में आदमी को स्वयं से बड़ी किसी सत्ता को स्वीकार करके अपने अहंकार के विसर्जन की सीख मिलती है। (वरना वह अपने को नियंता ही मान बैठेगा)

कर्म और भाग्य के छोरों को मिलाने वाला सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है - ‘कर्म करो और फल को भाग्य पर छोड़ दो।’ इससे कभी संभावित निराशा नहीं होगी। कर्म अनिवार्य है। असली बनकर ‘दैव-दैव’ पुकारने वाले पुरूष पुरूषार्थहीन और कर्महीन कहे जाते हैं। कर्महीनों के विरूद्ध (और पुरूषार्थियों के पक्ष में) संत तुलसीदास ने लिखा है ‘सकल पदारथ है जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’ सच है, पुरूषार्थी यदि ठान ले तो क्या नहीं पा सकता। निरंतर कर्मरत रहने वाले व्‍यक्ति अपनी मंजिल पा ही लेते हैं। मदर टेरेसा ने क्या-क्या हासिल करके नहीं दिखा दिया। इसके विपरीत, जो केवल भाग्य की प्रतीक्षा करते हैं वे अपने दुर्भाग्य कोही रोते दीखते हैं। ‘अमरवाणी’ में पढ़ा था - ‘भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर, भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँधकर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है।

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Friday, July 13, 2012

Bolte Vichar 55 Apne bare me dusro ki rai

अपने बारे में औरों की राय
आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



हम अपने बारे में ‘खुद’ क्या सोचते हैं और हमारे बारे में ‘दूसरे लोग’ क्या सोचते हैं-सफलता के लिए इन दोनों ही बातों पर ध्यान देना जरूरी हैं। पहली बात पर इसलिए कि आदमी के जैसे विचार होते हैं वह वैसा ही बन जाता है और दूसरी बात पर इसलिए कि आदमी स्वयं अपना मूल्यांकन ठीक से नहीं कर पाता। हम अपनी नजरों में चाहे कितने ही गुणी क्यों न हों, यदि दूसरे लोग हमें इस तथ्य का प्रमाणपत्र नहीं देते हैं तो हम जंगल में नाचनेवाले मोर के समान हो जाएँगे। दूसरों की अपने बारे में राय के महत्‍व के कारण ही कहा जाता है कि ईमानदार होना मात्र पर्याप्त नहीं है, ईमानदार दीखना भी जरूरी है।

जितना जरूरी दूसरों की अपने प्रति अच्छी राय का होना है उतना ही जरूरी यह जानना है कि वे ‘दूसरे’ किस स्तर के लोग हैं। आपको इस बात की बिलकुल परवाह नहीं करनी है कि आपके बारे में चोर-उचक्के क्या सोचते हैं। गांधीजी के बारे में दुनिया की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ और अन्य करोड़ों ‘सामान्य’ आदमी क्या सोचते थे, यह महत्‍वपूर्ण है, न कि यह कि गोडसे क्या सोचता था।

हर आदमी का एक सामजिक दायरा होता है। वह उत्‍तरदायी भी सबके प्रति नहीं, वर्ग विशेष के प्रति ही होता है। अपने दायरे के बाहर के लोगों को और जिनके प्रति वह उत्‍तरदायी नहीं होता उन लोगों को संतुष्ट कर पाना उसके लिए कई बार और भी कठिन होता है। उन असंतुष्ट व्यक्तियों की राय में वह अयोग्य और उनकी गालियों का शिकार होता है। लेकिन ऐसी स्थिति में उसे हताश होने की जरूरत तब नहीं होनी चाहिए जब उसे उसे लोग अच्छा मानते हों, जिनकी उसके प्रति राय वस्तुतः मायने रखती है। विद्यार्थी के सही परिश्रम का मूल्यांकन करना किसी अपढ़-गँवार का नहीं, उसके अध्यापक और परीक्षक का काम होता है। यदि आप खराब आदमी की राय में खराब हैं, तब तो आपको खुश होना चाहिए।

आप अपने कर्तव्य के प्रति चाहे किसी भी सीमा तक निष्ठावान् रहिए और चाहे कितने ही घंटे नित्य परिश्रम कीजिए, लेकिन अपने बॉस और अन्य सहकर्मियों, अपने परिवार और संगी-साथियों तथा अपने शुभचिंतकों और सामान्य मिलने-जुलनेवालों की उपेक्षा कभी मत कीजिएः क्योंकि उन सबकी आपके प्रति राय ही आपके सामाजिक जीवन की दिशा निर्धारित करती है। अपने को अच्छा और ऊँचा तथा सफल बनाने और दिखाने के लिए असामाजिक होना बिलकुल जरूरी नहीं हैं। यदि आप दुनिया का बहिष्कार करेंगे तो दुनिया आपका बहिष्कार करेगी। चैबीसों घंटे अपने में ही लिप्त रहनेवालों को लोग ‘पागल’ और सिर्फ अपनी तारीफ करनेवालों को ‘कृपमंडूक’ कहते हैं।

यदि आप अपने बारे में उतना ही अच्छा सोचते हैं जितना आपके बारे में ज्यादातर लोग सोचते हैं, तब आपको भविष्य में अपने असफल होने का भय नहीं रहेगा; क्योंकि तब आपके कार्यों का मूल्यांकन सही होगा। इसके विपरीत, यदि आप अपने प्रति अन्यों की राय की बिलकुल भी परवाह न करते हुए सिर्फ अपनी राय को ढोते रहेंगे तो आपके विरोधियों की संख्या निरंतर बढ़ती चली जाएगी। इस प्रकार, सफलता का रास्ता चुनना स्वयं आपके हाथों में हैं।

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Monday, April 2, 2012

बोलते वि‍चार 54- नौकरी में निष्ठा


नौकरी में निष्ठा

आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 

अपनी नौकरी के प्रति वफादार होना सबसे बड़े ईमान की बातों में से एक है। कारण यह है कि उसी से व्यक्ति को पेट पालने का स्थिर आधार मिलता है और उसीसे उसका सामाजिक महत्‍व निर्धारित होता हैं।
एक साहब महाविद्यालय में स्थायी व्याख्याता हैं और साथ में वहाँ के एक छात्रावास के अस्थायी वार्डन भी हैं। उनका वेतन उनके वार्डन होने के भत्‍ते से बीस गुने से भी अधिक है; लेकिन वे दिन-रात वार्डनी ही करते रहते हैं, व्याख्याता पद की मानी खाते हैं। उनकी सारी वफादारी ‘वार्डनी’ पर केंद्रित है, क्योंकि उसकी कमाई ‘उपरी आमदनी’ है, जो छिन सकती है। जबकि व्याख्याता वाली आमदनी उनके लिए बँधी-बँधाई जागीर बन चुकी है।
यह ‘ऊपरी आमदनी’ विविध रूपों में आदमी को निष्ठाहीन और गैर जिम्मेदार ही नहीं, कृतध्न और भ्रष्ट भी बनाती जा रही है। लोग कार्यालय के मुख्य समय में काम नहीं करते और ओवर टाइम के लिए रास्ता तैयार करते रहते हैं। उनकी मूल फाइलें पड़ी रहती हैं, जिन्हें निबटाना उनका प्रथम कर्तव्य के समान होना चाहिए, क्योंकि उसी काम की उन्हें तनख्वाह मिलती है; पर वे ऊपरी पारिश्रमिक के कार्मी या अतिरिक्त धंधों में लिप्त रहते हैं। चपरासी लोग चमरासीगीरी ठीक से नहीं करेंगे, वे गाय-भैंय पालकर उसका दूध बेचने के काम को अपना पहला धर्म मान लेंगे। ऑफिस की अवधि में वे घास काटने के लिए चल देंगे। बड़े-बड़े प्रोफेसर खुद अपनी संख्या के विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाएँगे, पर दुनिया भर से अपने संबंध जोड़ने और टी.ए.,डी.ए. के चक्कर में आएदिन बाहर की दौड़ लगाते रहेंगे।
एक कथन है कि मूल की अपेक्षा ब्याज और बेटे-बेटी की अपेक्षा पोता-नाती ज्यादा प्यारा होता है। लेकिन आदमी यह भूल जाता है कि यदि मूल ही न हो तो ब्याज कहाँ से आएगा और जब बेटा-बेटी ही न हो तो पोते-नाती का अस्तित्व कहाँ से होगा।

 सही ओवर टाइम और अर्जित पारिश्रमिक गलत चीजें नहीं हैं; लेकिन ऊपरी आमदनी यदि कियी काम के लिए पूर्व निर्धारित समय में कोई दूसरा काम करके या मूल काम को सिर्फ ओवर टाइम में करके बढ़ाई जाती है, अथवा उसे रिश्वत आदि के जरिए बढ़ायता जाता है तो वह नैतिकता और वैधानिकता दोनों दृष्टियों से वांछनीय नहीं कही जा सकती।

आदमी यदि अपनी नौकरी से संबंधित मूल काम निष्ठा के साथ नहीं करता है और किसी अन्य काम के प्रति वफादारी निभाता है तो उसमें अपना पेट पालनेवाले के प्रति भी अहसानमंद न होने का अवगुण पनपता रहेगा। उसे खुद अपनी चमड़ी को छोड़कर सारी दुनिया से शिकायत रहेगी; उसमें संतोष और उससे मिलने वाले सुखी की हमेशा कमी रहेगी।

अच्छे और बुरे कर्मचारी सभी जगह हुआ करते हैं, बुरे कर्मचारी ‘बुरे’ प्रायः इसलिए होते हैं कि वे कामकाम करते हैं और अपनी नौकरी में दिन-रात अभाव देखते रहते हैं। इसके विपरीत, अच्छे कर्मचारी ‘अच्छे’ इसलिए होते हैं कि उन्हें वफादारी के साथ अपना काम पूरा करने से इतनी फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अभावों को सोचने में अपना समय बरबाद करें। वरना अभाव कहाँ नहीं हैं और अपूर्णता किस व्यवस्था और किस मानव में नहीं है? अगर आदमी सिर्फ यह सोचकर नौकरी किया करे कि उसकी सौ में से सौ बातें जब भगवान् भी पूरी नहीं किया करते तब भला नौकारी में यह कैसे संभव होगा कि उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो जाएँ, तो उसे अपनी बहुत सी शिकायतें निर्मूल लगने लगेंगी। ‘नौकरी’ की अर्थ ‘सेवा’ है। ‘सेवा’ अपनी नहीं, दूसरों की होती है। जो लोग नौकरी करके सिर्फ अपनी सेवा चाहते हैं, वे उस नौकरी के लिए अयोग्य और कुपात्र होते हैं।

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Thursday, March 29, 2012

बोलते शब्‍द 84 सभापति एवं अध्‍यक्ष



166.  'सभापति'  व 'अध्‍यक्ष' 
  बोलते शब्‍द 84


 आलेख 
 डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा         


स्‍वर      
संज्ञा टंडन
         







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Thursday, March 1, 2012

बोलते वि‍चार 53- रचनात्मकता में निष्ठा

रचनात्मकता में निष्ठा
बोलते वि‍चार 53
आलेख व स्‍वर - डॉ.आर.सी.महरोत्रा

आदमी की रचनात्मक और विध्वंसात्मक वृत्‍ति‍यों की नींव प्रायः बचपन में ही पड़ जाती है। इसमें ‘बहुत कुछ’ माता-पिता की ट्रेनिंग और संगी-साथियों के स्वभाव का हाथ रहता है। कुछ किशोर आरंभ से ही संयमित दीखते हैं, जबकि दूसरे समवयस्क तोड़-फोड़ करने के अलावा कुछ नहीं जानते। कोई बीमारी अचानक ही बाहर नहीं आया करती, वह पहले भीतर-ही-भीतर अपना घर बनाया करती है। बुरी आदतों को बीमारी ही समझिए। हर बीमारी की तरह बुरी आदतें भी शुरू में बहुत छोटी होती हैं, जो रोकी न जाने पर उग्र रूप धारण करती जाती हैं। बहुत मामूली उदाहरण है कि कुछ लोग साफ-सुथरी दीवार पर कोई भद्दी बात लिखकर उसे गंदा कर देते हैं। उससे उनके मन का विकार भी प्रकट होता है और सामान्य पढ़ने वालों के मन में लिखने वालों के प्रति जुगुप्सा आदि भी होती है। लिखने वाला व्यक्ति यह नहीं सोच पाता कि इससे उसके प्रति सभ्य लोगों का भाव प्रशंसात्मक कभी नहीं हुआ करता।

छात्रावासों और विद्यालयों में बिजली के स्विच आदि कुछ छात्र सिर्फ तोड़ने के लि‍ये तोड़ते है; उससे होने वाले नुकसान, असुविधा और ख़तरे के बारे में सोच पाना शायद उन्हें विरासत में नहीं मिला होता । रेल के डिब्बों में भी की गई ऐसी टूट-फूट उसे करने वालों की कुत्सित मनोवृत्‍ति‍ की ही द्योतक होती है। खेतों से चोरी करके उन्हें कम-ज्यादा उजाड़ देना और वर्षों की अवधि तथा पर्याप्त मेहनत से तैयार हुए सड़क स्थित पेड़ों की टहनियाँ और विशेषकर होली पर बड़ी-बड़ी शाखाएँ तोड़ डालना बिगड़ी हुई औलादों के काम हैं। दूसरों का नुकसान करने में आनंद लेने वाले ऐसे लोगों को खुद अपनी कमीज़ का एक बटन भी तोड़ने में बहुत दर्द होता है। यही असामाजिक लोग आगे चलकर समाज और राष्ट्र के लिए तब नासूर बन जाते हैं जब इनका हमला रेल की पटरियों की तोड़-फोड़ और जगह-जगह बम फोड़ने एवं हत्याएँ करने तक बढ़ जाता है। बचपन का छोटा सा चोर शह मिलने पर आगे चलकर डाकू बन जाता है। यदि बदनाम छात्र नेता राजनीति में चले जाते हैं तो वहाँ भी वे बदनामी के ही दायरे में हाथ-पैर मारा करते हैं।

साँपों से छुटकारा पाने का सही तरीका यह है कि सपोलों को ही नहीं पनपने दिया जाए। किसी भी चीज को सही दिशा में मोड़ तब तक जरूर दे दिया जाना चाहिए जब तक उसमें लचीलापन विद्यमान रहता है। इसका परोक्ष अर्थ यह निकलता है कि अपने आरंभिक जीवन में सज्जनता और शालीनता का पाठ पढ़ने वाले लोगों के संस्कार उन्हें जीवन भर इन्सानियत की रचनात्मक भावभूमि पर बैठाए रखते हैं। जिसने शुरू से ही अच्छी भाषा और अच्छे व्यवहार पर अधिकार कर लिया हो, उसे आगे चलकर उससे संबंधित गलतियों के जाल में फँसने की स्थिति नहीं झेलनी पड़ती।

रचनात्मकता और विध्वंसात्मकता का संबंध हर घर से है, अड़ोस-पड़ोस से है, देश-विदेश से है। कहावत है कि चैरिटी घर से ही शुरू होती है। जो आदमी घर में संबंध अच्छे रखना जानता हैं, वह बाहर भी उन्हें अच्छा रख सकता है। प्यार ही प्यार को उपजाता है। सबको पता है कि शक्कर डालने से चीज मीठी होती हैं। अब अगर नींव के रूप में ही इन बातों का प्रशिक्षण और अभ्यास घर-घर में होने लगे तो आदमी के चरित्र के मजबूत होने में कोई संदेह नहीं रहे।

अंत में, बचपन की आदतों से आगे के जीवन के संबंध को एक बार फिर इन शब्दों में दोहरा लिया जाए कि निर्माण के लिए ऊपर की ईंटों का नीचे की ईंटें ही आधार बनती हैं।

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Thursday, February 23, 2012

बोलते वि‍चार 52- बड़े पद वाले और छोटे पद वाले

 
बोलते वि‍चार 52
 बड़े पद वाले और छोटे पद वाले
आलेख व स्‍वर - डॉ.आर.सी.महरोत्रा


हमें कई बार अपने पद से ऊपर के पद पर बैठे हुए व्यक्ति से भिन्न-भिन्न प्रकार की शिकयतें रहती है; जैसे-वह हमारी पदोन्नति नहीं करता, वह हमारी सुख-सुविधाओं का ध्यान नहीं रखता, वह स्वार्थ में लिप्त रहता हैं, वह अन्यों का पक्ष लेता है इत्यादि। लेकिन यदि हम स्वयं को उसकी परिस्थितियों में डालकर देखें तो ये शिकायतें प्रायः निर्मूल होती हैं, क्योंकि हम अपना पक्ष तो सोच डालते हैं, पर उसकी जिम्मेदारियों और कठिनाइयों की ओर बिलकुल ध्यान नहीं दे पाते। जिस तरह हम चाहकर भी और कोशि‍श करके भी स्‍वयं अपने लि‍ये या दूसरों के लि‍ये बहुत सी बातें पूरी नहीं कर पाते हैं, उसी तरह वह भी बहुत सी बातें चाहकर भी और कोशिश करके भी पूरी नहीं कर पाता है। जिस प्रकार हमारी सीमाएँ हैं उसी प्रकार हर बड़े की भी सीमाएँ होती है। 

एक उपाध्यक्ष महोदय अपने अध्यक्ष के हर वक्त खि़लाफ रहते थे। कुछ वर्ष बाद उन्हें अन्‍यत्र अध्यक्ष पद मिल गया। आजकल वे अपने पुराने अध्यक्ष के बेहद अनुकूल हैं, क्योंकि ‘उनका अनुभव बढ़ गया है’। उन्हें अपनी नई जगह पर ठीक वही अभाव और अपने छोटों को कितनी ही बातों में संतुष्ट न रख पाने से संबंधित कठिनाइयाँ झेलनी पड़ रही हैं।

एक विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के अध्यक्ष बार-बार अपने कुलपति से यह आग्रह करते थे कि उन्हें शीघ्र ही एक अध्यापक और दिया जाना चाहिए। उसकी उनके विभाग को सख्त जरूरत हैं। कुलपति के द्वारा सदा असमर्थता व्यक्त की जाने पर वे कुलपति को अल्पद्रष्‍टा और दोषी ठहराते थे। भाग्य से एक वर्ष बाद वे ही उस विश्वविद्यालय के कुलपति बना दिए गए। तब राजनीति विभाग के अगले वरिष्ठ अध्यापक अर्थात् कार्यकारी अध्यक्ष बहुत प्रसन्न होकर कि उनके पूर्व अध्यक्ष अर्थात् वर्तमान कुलपति उस विभाग के लिए अतिरिक्त अध्यापक की जरूरत को बहुत अधिक समझते ही हैं, अध्यापक की माँग लेकर उनके पास इस विश्वास के साथ गए कि कुलपति उनकी माँग को फौरन मान लेंगे। लेकिन नए कुलपति का उत्‍तर था-‘पहले मेरी दृष्टि केवल राजनीति विभाग तक जाती थी, क्योंकि तक मैं कम ऊँचाई पर बैठा था। अब अधिक ऊँचाई पर बैठने से मेरी निगाह दूर-दूर तक जा रही है और मुझ बहुत से अन्य विभागों की भी उतनी ही बड़ी जरूरत दिखाई देने लगी है। यदि मैं केवल राजनीति विभाग को अध्यापक दे दूँगा तो उचित नहीं होगा।’ इस घटना से यह सिद्ध होता है कि‍ बड़े पदाधि‍कारी की जि‍म्‍मेदारि‍यां भी बड़ी होती हैं और उसे ज्‍यादा बड़े क्षेत्र की जरूरतें देखनी होती हैं। साथ ही उसे बड़े पैमाने पर आलोचनाएँ और गालियाँ सहनी पड़ती हैं।

घर के बड़े को ही सब ओर की चिंता रहती है कि वह कहाँ से पैसा लाए, कैसे गाड़ी खींचे, कहाँ कटौती करे, किसको नाराज करे और किसकी बात कहाँ तक माने। वह सभी बच्चों आदि की इच्छाएँ पूरी करना चाहता है, सबका भला सोचता है, सबकी माँगों की पू र्ति‍ की इच्छा रखता है (बशर्ते वह अंदर से बड़ा हो); पर ऐसा वह पूरी तरह से कर कभी नहीं पाता। छोटे समझते हैं कि बड़ा उन पर राज करता है; जबकि बड़े को सर्वदा प्राथमिकताओं के सहारे जीना पड़ता है। छोटे अपने हित-संपादन की तथा बड़ों की क्षमताओं की सीमाएँ नहीं जान पाते हैं। एक उदाहरण है कि घर के बच्चों की बढ़ती हुई शिकायर्तो पर एक बार पिता ने अपना पूरा वेतन बच्चों के हाथों में सौंपकर कहा कि घर का खर्च अब तुम लोग ही चलाया करो। कहने की जरूरत नहीं कि एक ही महीने में उन्हें नानी याद आ गई।

बहुत वर्ष हुए, पांडिचेरी के ‘अरविंद आश्रम’ में एक बार नपा-तुला मासिक राशन मिलने पर वहाँ के व्यक्तियों ने बाँटने वाले से प्रतिदिन ज्यादा राशन की माँग की। उसने यह बात माँ को बताई। माँ ने अनपेक्षित ढंग से कह दिया कि वे जितना भी माँगें, दे दो। उनके इस उत्‍तर पर आश्‍चर्यचकित होते हुए बाँटनेवाला बोला कि ऐसे तो तीस दिन का राशन बीस दिन में ही समाप्त हो जाएगा। यह सुनकर माँ ने कहा कि तब उनसे कह देना कि राशन समाप्त हो गया। ग़ज़ब का सादा, लेकिन उससे भी अधिक ग़ज़ब का प्रभावशाली उत्‍तर था माँ का यह। सुनते ही आश्रम के सारे व्यक्तियों को आँखे खुल गईं कि यदि अभी हमने ज्यादा-ज्यादा खाया तो महीने के अंतिम हम दिन हमें भूखा रहना पड़ेगा। यह है बडे़ और छोटे पदवालों का अंतर।