Wednesday, October 19, 2011

बोलते वि‍चार 25 - त्याग और समाज-हित

बोलते वि‍चार 25

 
आलेख व स्‍वर - डॉ.आर.सी.महरोत्रा
कुछ लोग त्याग और दान की बात तो खूब करते हैं, पर अपने सुख-साधनों में कटौती बाल भर भी करने को तैयार नहीं होते। वे अपने और अपनों के ऊपर हमेशा इतना अधिक आवश्यकता से अधिक-खर्च करते हैं कि उनके पास दान करने के लिए कुछ बचने की नौबत ही नहीं रह जाती। दूसरी ओर, जिन लोगों की आमदनी बहुत ज्यादा होती है और जिनके सामने उनके सारे जरूरी-गैर जरूरी खर्च करने के बाद भी बचत की स्थिति अनिवार्य रूप से बनी रहती है, वे कई बार त्याग और दान का अभिमान जताते हुए कहते हैं कि वे मरते समय अपना सब कुछ दान कर जाएँगे। अरे, यदि उन्हें सिर्फ मरते समय अपनी सम्पत्ति दूसरों को देनी हैं,तब उसमें उनका त्याग और स्वार्थहीनता कहाँ रहीं। उन्होंने जीवन भर तो ऐश किए समाज के लिये कुछ नहीं किया, लेकिन अंत में जब वे अपने ऊपर एक कौड़ी भी खर्च कर सकने की हालत में नहीं रह गए-मरते समय,तब उन्हें दान-पुण्य की सूझी। वह भी शायद अपना परलोक सुधारने के लालच में।


मुहम्मद साहब ने कहा था -‘जि़न्दगी में एक सिक्का खैरात करना मौत के समय सौ सिक्के खैरात करने में कहीं बेहतर है।’

कुछ लोग तर्क करते हैं कि दान के पूर्व हमें अपने सही खर्च पूर कर लेने चाहिये। ठीक है; जब हम खुद ही नहीं जियेंगे तो दूसरों के लिये कुछ कैसे कर पायेंगे। लेकिन प्रश्न है कि ‘सही’ खर्च क्या होते हैं ? क्या ऐसे खर्चों की कोई सूची और सीमा है ?

पहले रोटी।
खाना कौन सा ‘सही’ होता है ? उसके लिये प्रति व्यक्ति कितने रूपए जरूरी है ? न्यूनतम और अधिकतम क्या है ?
फिर कपड़ा।
यों हमारा काम गिने-चुने कपड़ों से चल सकता है, पर नहीं। क्या ‘सही’ खर्च के नाम पर हमें कम-से-कम एक दर्जन सूट और डेढ़ दर्जन साडि़याँ जरूर चाहिये ?
अब मकान।
हमारे पास भारी सुविधाओं से युक्त एक मकान होना चाहिये। लेकिन कितना बड़ा ?और ‘सारी सुविधाओं’ का अंतिम बिन्दु कहाँ है ?

दरअसल, ‘त्याग वृत्ति’ का अर्थ बहुत व्यापक है। यदि हम कोई चीज खरीदने की नीयत रखते हैं और उसे खरीद सकने की स्थिति में भी नहीं होते है- साथ ही कंजूस भी नहीं होते, लेकिन फिर भी उसे नहीं खरीदते- तभी ‘त्याग वृत्ति’ होती है। ऐसे  सुप्त त्याग से अप्रत्यक्ष दान स्वतः हो जाता है। वह कैसे? वह ऐसे कि खूब खरीदी-खरूदी करके चीजों के दाम बढ़वाने में हमारा बहुत हाथ रहता है। जब खरीदारियाँ बढ़ती हैं तब उत्पादन भी बढ़ाना पड़ता है। जब हम चीजों को खरीद-खरीदकर बाजार में उनका अभाव कर डालते हैं तब उनके दाम बढ़े बिना नहीं रहते। इसके विपरीत, यदि हम सारे खर्चों में कटौती कर दें -अर्थात् त्याग का व्रत ले लें-तब चीजें बाजार में बची रहने के कारण उनके मूल्य नहीं बढ़ेंगे और इस दिशा में समाज का हित खुद-ब-खुद हो जाएगा।

कुछ लोग घर की टूटी -फूट और बिलकुल बेकार की चीजों को फेंकने के बजाय किस को जबरदस्ती देकर अपने दान और त्याग की महिमा प्रचारित करते हैं। ऐसे दान का महत्व ‘नहीं’ के बराबर होता है,क्योंकि इसमें त्याग न होकर अपने यहाँ की गंदगी साफ करने के साथ-साथ उसी से दूसरों पर अहसान करने की वृत्ति रहती है। यदि, उदाहरणार्थ अपने घर बचा हुआ खाना ज्यादा बासी हो जाने के कारण आपने इस डर से खुद नहीं खाया कि आपकी तबीयत खराब हो जाएगी और उसे किसी बाह्य व्यक्ति को दान या भिक्षास्वरूप खिला दिया तो अपना मूल्यांकन कीजिए कि क्या अपने ‘समाज-हित’ किया ?

Production _ Liba Media Group, Bilaspur (C.G.) India

2 comments:

  1. बढिया प्रस्‍तुति।

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  2. बहुत अच्‍छा......

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