Sunday, January 8, 2012

बोलते वि‍चार 46- अपना और दूसरों का मूल्यांकन




बोलते वि‍चार 46
आलेख व स्‍वर - डॉ.आर.सी.महरोत्रा


एक बहुत नए छुटभैए कवि ने अपने दोस्तों में अपनी तुकबंदियाँ सुनाने के बाद सीधे नीरज के पास वे ‘कविताएँ' यह लिखकर भेज दीं कि इन पर समीक्षा लिख दीजिए, मैं उसे यहाँ के समाचारपत्र ‘मोहल्ला जागरण’ में छपवाऊँगा। यह उस कवि की घोर नादानी थी।

अपने किसी छोटे स्तर के समय-खपाऊ काम के पूरा करने के लिए किसी बहुत बड़े आदमी को तंग मत कीजिए। इसमें कोई शक नहीं है कि यह काम आपके लिए महत्व का हो सकता है; लेकिन यह भी सही है कि बड़ा आदमी अपनी भारी जिम्मेदारि‍यों और बड़े स्तर के कामों में इतना ज्यादा घिरा रहता है कि उसके पास आपके उस काम के लिए दम मारने की भी फुरसत नहीं रहती है-विशेषकर ऐसे काम के लिए, जिसे आप अपेक्षाकृत बहुत छोटे आदमियों से भी करवा सकते हैं। अपना कोई बचकाना काम बड़े आदमी पर लादकर आप उसकी हैसियत को बहुत नीचा आंकते हुए उसकी बेइज्‍़ज़ती करते हैं और अपनी औकात को असलि‍यत से बहुत ऊँचा मानते हुए अपना हलकापन सिद्ध करते हैं।

आपका स्वार्थ अपनी जगह ठीक है; पर ऐसे अवसरों पर उस स्वार्थ की तुलना में आपका अज्ञान और आपकी कूपमंडूकता अधिक सिद्ध होती है, क्योंकि आप बड़ों के बड़ेपन की ऊँचाई को लेशमात्र भी नहीं नाप पाते।
    
बी.ए. प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने विश्वविद्यालय के कुलपति के पास एक पत्र भेजकर यह पूछा कि मुझे इन-इन शब्दों के सही अर्थ और प्रयोग लिख भेजिए। ऐसी नासमझी पर कह दिया जाता है कि ‘मक्खी आखिर कितना ऊँचा उड़ेगी।’
    
कृपया मक्खी न बनिए। किसी काम को करवाने के लिए दूसरों को सौंपने के पहले अपनी भी मूल्यांकन कीजिए और सामने वाले का भी।


Production - Libra Media Group, Bilaspur (C.G.)

2 comments:

  1. बढिया पोस्‍ट।

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  2. आपका स्वार्थ अपनी जगह ठीक है; पर ऐसे अवसरों पर उस स्वार्थ की तुलना में आपका अज्ञान और आपकी कूपमंडूकता अधिक सिद्ध होती है, क्योंकि आप बड़ों के बड़ेपन की ऊँचाई को लेशमात्र भी नहीं नाप पाते। Bahut Khub...Dhanyabaad.....

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