Wednesday, October 27, 2010

बिलासपुर : इतिहास के झरोखे से

छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा शहर बिलासपुर जहाँ प्रदेश का उच्च न्यायालय स्थित है औरं इस संस्कारधानी बिलासपुर को इसीलिये न्यायधानी बिलासपुर के रूप में भी जाना जाता है। बिलासपुर के आसपास रतनपुर, मल्हार, शिवरीनारारायण, तालागाँव जैसे स्थल ये कहते हैं कि पुरातात्विक संदर्भ में ये क्षेत्र बेहद समृद्ध रहा है। यहाँ की आज की खूबियाँ तो सबकी नजरों में हैं लेकिन सौ सालों पहले बिलासपुर क्या था, कैसा था, उसके कुछ अवशेष, कुछ उपलब्ध जानकारियों का लेखा-जोखा हम भारतीय सांस्कृतिक निधि (इन्टैक) बिलासपुर अध्याय के शोध व आलेख के आधार पर आपके लिये पॉडकास्ट के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।



ऐतिहासिक दृष्टि से बिलासपुर क्षेत्र में बिलासपुर नगर की स्थापना का कोई विवरण प्राप्त नहीं होता। एक अस्पष्ट मछृआरी बस्ती की मछुआरिन बिलासा जो देवार गीतों में महिमा मंडित है, उसकी तथाकथित मर्यादा रक्षा हेतु आत्मदाह की गाथा परस्पर विरोधी है। कई लोग पलाश वृ़क्षों से आच्छादित इस बस्ती को पलाशपुर से बेलासपुर/बिलासपुर हुआ मानते हैं।

1770 से पूर्व बिलासपुर बस्ती का कोई उल्लेख नहीं मिलता। 1742 में भास्कर पंत द्वारा हैहयवंशी राजा रघुनाथ सिंह को परास्त करने के पश्चात् भोंसले राजा रतनपुर में स्थापित हो गए। भास्कर पंत की मृत्यु के पश्चात् रघुनाथ सिंह ने पुनः अपना आधिपत्य जमाया पर 1755 में राधो जी प्रथम द्वारा रतनपुर फिर से अधिग्रहित कर लिया गया। छत्तीसगढ़ का राज्य बिम्बाजी को मिला और राजधानी रतनपुर ही रही। 1758-1787 के मध्य बिम्बाजी ने मछुआरी बस्ती बिलासपुर में रात्रि विश्राम हेतु अरपा तट पर एक किला बनवाना शुरू किया (1770) जो पूर्ण नहीं हो सका और परकोटे के रूप में रहा। यहीं पर नीचे पचरीघाट बना जहां से नौका द्वारा सेना अरपा पार कर रतनपुर जाती थी। बिम्बाजी की मृत्यु के पश्चात् उनकी विधवा आनन्दी बाई ने सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखते हुए 1788 में व्योंकोजी को छत्तीसगढ़ का सूबा सौंपा। 1788 से 1816 तक छत्तीसगढ़ का सूबा मराठों के आधिप्रभाव में रहा पर 1816 में तत्कालीन सूबेदार अप्पा साहब एवं ब्रिटिश के मध्य हुई संधि के अंतर्गत छत्तीसगढ़ क्षेत्र ब्रिटिश अधिप्रभाव में आ गया तथा उसके साथ ही बिलासपुर भी।

लेकिन इस संधि से निराश अप्पा साहब ने 1806 से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पिंडारियों की मदद से ब्रिटिश कंपनी से छुटकारा पाने के लिये एक नया सैन्य दल बनाना शुरू किया जिसकी परिणिति अंततोगत्वा पिंडारियों के नाश के साथ सीताबल्डी के तीसरे मराठा युद्ध में 1817 में हुई। संधि के अनुसार नागपुर राज्य की सीमाओं को चार जिलों में बाँटा गया जिसमें छत्तीसगढ़ एक था। सुचारू प्रशासन हेतु एक सुपरिटेण्डेन्ट नियुक्त किया। रतनपुर छत्तीसगढ जिले की राजधानी थी और कैप्टन एडमेण्ड्स प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक। 1818 में एडमेण्ड्स की मृत्यु के पश्चात् 1818 से 1825 तक अधीक्षक रहे कर्नल ऐग्न्यू ने छत्तीसगढ़ का मुख्यालय रतनपुर से हटाकर रायपुर बना दिया।

1830 में राधोजी तृतीय के वयस्क होने पर छत्तीसगढ़ सूबा उन्हें सौंपा गया पर 1854 में उनके निःसंतान मरने पर डलहौजी की डॉक्टरिन ऑफ लेप्स नीति के अंतर्गत नागपुर राज्य पुनः ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया।
1856 में बिलासपुर को तहसील का दर्जा दिया गया और 1857 की महान क्रांति की अवधि में 3 नेटिव इन्फैन्ट्री बैटरी की स्थापना रायपुर एवं बिलासपुर में की गई। जनवरी 1858 में रायपुर बैटरी का सैन्यदल ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत पर उतर आया जबकि बिलासपुर में बगावत कोई हलचल नहीं हुई। बिलासपुर क्षेत्र के उत्तर में सोहागपुर क्षेत्र में छिपे विद्राहियों को पकड़ने डिप्टी कमिश्नर को बिलासपुर क्षेत्र से गुजरना पड़ा। 1861 में बिलासपुर को जिले का दर्जा प्राप्त हुआ तथा 1867 में नगरपालिका की स्थापना हुई।

1887 में बंगाल नागपुर रेल्वे के अंतर्गत बिलासपुर में रेल लाइन बिछी और 1890 में बिलासपुर स्टेशन बना तथा 1891 में बिलासपुर जंक्शन। 1998 में बिलासपुर जोन की घोषणा हुई। 2003 में बिलासपुर जोन दक्षिण पूर्व मध्य रेल्वे के रूप में देश का 16 वां जोन बना।

2000 में नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य की न्यायधानी उच्च न्यायालय की स्थापना के कारण बिलासपुर को विस्तार के नए आयाम मिले। बिलासपुर की पहचान रेल्वे स्टेशन, रेल्वे कॉलोनी से होती थी। अतः बिलासपुर में जो भी भवन स्मारक तथा निर्माण दिखते हैं उनकी आयु ब्रिटिश साम्राज्य के काल से है। सिवाय जूना बिलासपुर किला एवं बावड़ी मराठा राज्य के अंतर्गत नागपुर-रतनपुर मार्ग में अरपा नदी को पार करने के पूर्व रात्रि विश्राम के लिये एक किले का निर्माण प्रारंभ हुआ पर किला पूर्ण नहीं हो सका। केवल परकोटा एवं दरवाजे बन पाए। इसी के साथ मछुआरों की बस्ती और घाट ‘पचरी घाट’, तथा पुराना बिलासपुर ‘जूना बिलासपुर’ बसा था। इसलिये इसे किला वार्ड कहते हैं पर अब परकोटे की दीवार, स्तंभ एवं दीवारों का नामेनिशान नही है। दीवार गिरा कर घर बना लिये गए हैं। यहाँ एक कुँआ था जिसका संबंध 500 मीटर दूर स्थित बावली से था। यह बावली अभी भी है और कहा जाता है कि एक सुरंग द्वारा यह किले तथा रतनपुर से जुड़ी थी। बावली के आंतरिक मुख को ब्रिटिश शासन काल में लोहे की चादर से बंद कर दिया गया था।

रेल्वे कालोनी - बिलासपुर नगर की पहचान एवं विकास का प्रथम मील का पत्थर बिलासपुर स्टेशन एवं रेल्वे कॉलोनी है। विभिन्न आवासीय कालोनियां-लोको कंस्ट्रक्शन, वायरलेस कालोनी, आफिसर्स कालोनी, रेल्वे अस्पताल, रेल्वे इंग्लिश मीडियम स्कूल, नार्थ ईस्ट रेल्वे इंस्टीट्यूट, यूरापियान क्लब, खेल मैदान, बुधवारी बाजार, सेंट अगस्टिन चर्च ये सभी एक शताब्दी से पुराने हैं। संपूर्ण रेल्वे कॉलोनी के दोनों ओर वृक्षों से आच्छादित अत्यंत साफ सुथरी अतिक्रमण से रहित लगभग दो कि.मी. क्षेत्र में फैली है और बिलासपुर नगर के व्यक्तित्व को मोहक बनाती हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पेण्ड्रा जाते समय 1922 में अपनी ‘फांकी’ शीर्षक कविता बिलासपुर स्टेशन पर लिखी थी। विख्यात उपन्यासकार स्वर्गीय विमल मित्र भी यहाँ रेल सेवा में थे।

पुराना पावर हाउस - द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व 1933-34 में तोरबा क्षेत्र में रेल्वे क्षेत्र के समीप लाहौर इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी के द्वारा पावर हाउस स्थापित किया गया जिसका लाइसेन्स सेंट्रल इंडिया इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी लाहौर को 30 वर्ष के लिये दिया गया, जिसके बाद राज्य सरकार उस संयंत्र को खरीद सकती थी। 1935-36 से बिलासपुर नगर का विद्युतीकरण हुआ। पुराने पावर हाउस की क्षमता 688 कि.वा. थी। यह कंपनी दूसरे नगरों करे विद्युत विक्रय किया करती थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् - 1950 में इसकी क्षमता 954किलोवाट तथा 1957-58 में 1454 किलोवाट हो गई। यह ताप विद्युत संयंत्र लाइसेंस की समाप्ति पर मध्यप्रदेश विद्युत मंडल द्वारा खरीद लिया गया तथा कालांतर में कोरबा विद्युत संयंत्रों द्वारा विद्युत आपूर्ति होने पर तथा बिलासपुर में 1966 में म.प्र. विद्युत मंडल की स्थापना से यह बंद हो गया। इसकी दो चिमनियाँ अतीत गाथा की प्रतीक हैं। यहाँ अब छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल का कार्यालय है।

टाउन हॉल तथा सिविल लाइन्स - पुराने बसाव स्थल पचरी घाट एवं किला वार्ड से 2 कि.मी. दूर पश्चिम में प्रशासनिक भवनों का निर्माण सिविल लाइन्स के रूप में हुआ। कलेक्ट्रेट, कलेक्टर बंगला, टाउन हॉल (1936) तहसील भवन (1926) रेस्ट हाउस (छत्तीसगढ़ भवन) सर्किट हाउस, यूरोपियन क्लब, ऑफिसर्स क्लब (1901) पुलिस लाइन्स (1880) पुलिस अस्पताल (1910) जिला जेल (1883) बिलासपुर के साफ सुथरे इलाकों में हैं जहाँ ब्रिटिश प्रभाव भवनों की निर्माण शैली में परिलक्षित होती है।

शिक्षण संस्थाएँ - बिलासपुर नगर में रेल्वे कालोनी तथा जिला मुख्यालय बनने के साथ, शिक्षा का प्रसार लॉर्ड मैकाले की नीति के अनुसार आरंभ हुआ। बर्जेस कन्या शाला (1885), रेल्वे सूरोपियन स्कूल (1892), गवर्नमेंट ब्वाएज स्कूल (1902), म्यूनिसिपल ब्वाएज स्कूल (1862/1885), मिशन ब्वाएज स्कूल (1926), सेंट जोसफ कान्वेंट (1945) प्रख्यात संस्थाएँ हैं। एस.बी.आर. कॉलेज के नाम से विख्यात महाविद्यालय 1944 में स्थापित हुआ। नार्मल स्कूल टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल के नाम से जाना जाता था जहाँ वर्तमान में हाईकोर्ट बिल्डिंग है। आई.टी.आई.कोनी (1945-1946)से संलग्न परिसर में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय (16 जून1983) प्रदेश का दूसरा सामान्य विश्‍वविद्यालय है जो अब सेन्ट्रल वि.वि. बन चुका है। छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) नवगठित राज्य का दूसरा चिकित्सा महाविद्यालय है जो सरदार वल्लभ भाई अस्पताल में (2001) में खुला।

पुराना पुल - प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् बिलासपुर के मध्य बहने वाली अरपा नदी पर पुल बनाया गया जिसका लोकार्पण 30 जुलाई 1926 को हुआ था। जिस पर आज भी विश्वसनीयता के साथ शहर का आवागमन चलायमान है।

गांधी चौक - शनिचरी पड़ाव के खुले स्थल में अरपा नदी के किनारे गांधी जी ने एक वट वृक्ष के नीचे चबूतरे पर खड़े होकर एक सभा को 1933 में संबोधित किया था। आज चबूतरा नहीं है पर उस स्थान पर स्वतंत्रता के पश्चात् जयस्तंभ बना दिया गया। यह स्थान आज भी गांधी चौक के नाम से जाना जाता है।

मिशनरी का योगदान - बिलासपुर नगर में रेल्वे कालोनी बनने के पूर्व ब्रिटिश राज के समय मिशनरीज लोग आ बसे और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा धार्मिक चेतना हेतु उन्होंने अथक प्रयास किये जिसका उदाहरण सेंट ऑगस्टिन चर्च, डिसइपल चर्च, बर्जेस गर्ल्स स्कूल, जैकमेन मेमोरियल मिशन अस्पताल, मिशन ब्वाएज स्कूल, शेफर स्कूल, कुदुदंड चर्च हैं। जरहाभाटा स्थित ऐशल बंगला एक शमाब्दी पुराना है। बिलासपुर का पहला यूरापियन कब्रिस्तान 1820-30 के बीच वर्तमान प्रेस क्लब भवन के पीछे स्थित है। यहाँ मात्र 3 कब्रें बची हैं पर इसी के कारण मोहल्ले का नाम मसानगंज पड़ा।

मंदिर - बिलासपुर के विकास में मुख्य योगदान मराठों, मिशनरीज एवं रेल्वे का रहा। चांटापारा में नदी किनारे स्थित राममंदिर 1904-1905 में अपने 100 वर्ष पूरे कर चुका है। देहनकर बाड़े से लगा यह मंदिर पूर्व में छोटे स्वरूप में चारों ओर आंगन एवं विभिन्न प्रकार के वृक्षों से घिरा था। इसमें मात्र एक मंदिर कक्ष था। धीरे धीरे दानदाताओं के सहयोग से यह विशाल रूप में आ चुका है।

व्यंकटेश मंदिर - 1942 में स्थापित नगर के मध्य स्थित इस मंदिर में व्यंकटेश्वर की प्रतिमा है। सांस्कृतिक, धार्मिक एवं संस्कृत विद्यालय के रूप में यह मंदिर दर्शनीय है।

श्री रामकृष्ण मिशन, कोनी - स्व. कुंजबिहारी लाल अग्निहोत्री का कोनी स्थित यह बंगला अरपा नदी के किनारे अवस्थित है जिसे श्रीमती अग्निहोत्री ने रामकृष्ण मिशन को दान दे दिया। इसके बगल के भूखंड में ठाकुर का विशाल मंदिर है तथा दूसरी ओर प्रयमरी स्कूल, औषधालय तथा लाइब्रेरी, मिशन द्वारा संचालित हैं।

बिलासपुर के जिला जेल में स्व.माखनलाल चतुर्वेदी -
12 मार्च 1921 को प्रांतीय राजनैतिक सम्मेलन बिलासपुर के शनिचरी पड़ाव में हुआ। जिसमें श्री माखनलाल चतुर्वेदी ने अत्यंत ओजस्वी भाषण दिया जिसके आधार पर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 12 मई 1921 को जबलपुर में गिरफ्तार कर लिये और व्हाया नागपुर बिलासपुर जेल में लाया गया। जहाँ वे 1 मार्च 1922 तक रहे। जेल में उन्होंने ‘पुष्प की अभिलाषा’, ‘पूरी नहीं सुनाओगे तान’, ‘पर्वत की अभिलाषा’ जैसी कविताओं की रचना की।

आलेख - भारतीय सांस्कृति निधि (इन्टैक) बिलासपुर अध्याय से साभार
प्रस्‍तुति - संज्ञा टंडन

3 comments:

  1. संज्ञा टंडन जी आपको इस पस्तुति के लिए बधाई...

    आपकी आवाज के जादू में बंधकर हमने इसे डाउनलोड कर लिया है ...

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  2. nice infirmation. keep it up, i am with you sangya ji.sorry for short comment.

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  3. कुछ काम में फंसा हुआ था, काफी दिन से आपके ब्लॉग पे नहीं आ पाया..
    एक सबसे अच्छी बात जो लगती है मुझे आपके ब्लॉग की वो ये की कुछ और काम करते हुए भी हम सुन सकते हैं आपकी पोस्ट..
    बहुत ही अलग तरह का ब्लॉग और बहुत सुन्दर जानकारी...

    मुझे बिलासपुर के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी...

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