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Tuesday, September 26, 2017
Thursday, August 24, 2017
Kamal Sharma vividh bharti, Yaadon ka Safarnama
छत्तीसगढ़ श्रोता संघ द्वारा रायपुर के वृंदावन हाॅल में आयोजित श्रोता सम्मेलन मेें विविध भारती के वरिष्ट उद्घोषक का सम्मान किया गया। इस अवसर पर उनके जीवनी, उनके बचपन के साथियों, प्रशंसकों, सहकर्मियों के संस्मरणों से युक्त आॅडियो सीडी का विमोचन किया गया।
प्रस्तुत हैं इसी सीडी के अंश इस पोस्ट में....
Monday, July 31, 2017
Wednesday, February 10, 2016
हमारी मुलाकातों की वर्षगांठ
3 जनवरी 2016
नये साल का स्वागत
पिछली बार बिदाई के समय हमसे हमारे बाबा दादियों ने एक वादा लिया था वो ये कि नये साल पर और हमारे इन बुजुर्गों से मिलने के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में हम कुछ न करें....बस जनवरी के पहले रविवार की दोपहर का भोजन उनके साथ बैठकर करें। भोजन वे लोग बनायेंगे और हमें खिलायेंगे। हमने भी खुशी ख़ुशी ये निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
3 जनवरी यानि नये साल का पहला रविवार, हम पहुंच गये नये साल का जश्न मनाने, उनके साथ लंच करने। जब हम वहां सुबह 11 बजे पहुंचे, तो हमारा इंतजार हो रहा था। खाना बन चुका था, पंगत बिछ चुकी थी और पकवान परसने को वे तैयार बैठे थे। हमारे उनके बीच नये साल की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ। उन्होंने हमें मुबारकबाद दी और हमने भी कामना की कि उनका ये साल हंसते-हंसते और खुशी से गुज़रे।
थाली पूरी भरी हुई थी...परोसा गया था पूड़ी, आलू की सब्जी, दाल, टमाटर की चटनी, दही बड़ा, पुलाव, सलाद, पापड़ और हलवा। पेट भरने के बाद भी हम खाते गये ....खाना इतना स्वादिष्ट जो था। खाने के बाद हमने मनाया जश्न...खेली अंत्याक्षरी...एक तरफ थे हम और दूसरी तरफ थे हमारे बाबा दादी। एक के बाद एक गानों की कतार... पर आखिरी में हम जीत गये।

इस बीच डाॅ.योगी ने पिछली बार अधिक शुगर और ब्लडप्रशर वाले 12 लोगों को फिर से जांचा परखा....उनकी पर्ची बनायी, दवायें दीं।
चलते चलते बुजुर्गों की तरफ से एक फरमाइश आई कि हमें पिक्चर ले चलो....हम भी मान गये और झट से 7 तारीख का प्रोग्राम बना डाला... सिर्फ 3 दिन बाद ही आ गई 7 तारीख, तब तक पीवीआर में व्यवस्था...उनको पीवीआर तक ले जाने की व्यवस्था और उनके उनके खाने की व्यवस्था कर ली गई और नया साल व हमारी मुलाकात का वार्षिक सम्मेलन संपन्न हुआ 64 लोगों द्वारा फिल्म ‘दिलवाले’ देखकर।
आलेख - रचिता
नये साल का स्वागत
पिछली बार बिदाई के समय हमसे हमारे बाबा दादियों ने एक वादा लिया था वो ये कि नये साल पर और हमारे इन बुजुर्गों से मिलने के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में हम कुछ न करें....बस जनवरी के पहले रविवार की दोपहर का भोजन उनके साथ बैठकर करें। भोजन वे लोग बनायेंगे और हमें खिलायेंगे। हमने भी खुशी ख़ुशी ये निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
3 जनवरी यानि नये साल का पहला रविवार, हम पहुंच गये नये साल का जश्न मनाने, उनके साथ लंच करने। जब हम वहां सुबह 11 बजे पहुंचे, तो हमारा इंतजार हो रहा था। खाना बन चुका था, पंगत बिछ चुकी थी और पकवान परसने को वे तैयार बैठे थे। हमारे उनके बीच नये साल की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ। उन्होंने हमें मुबारकबाद दी और हमने भी कामना की कि उनका ये साल हंसते-हंसते और खुशी से गुज़रे।
थाली पूरी भरी हुई थी...परोसा गया था पूड़ी, आलू की सब्जी, दाल, टमाटर की चटनी, दही बड़ा, पुलाव, सलाद, पापड़ और हलवा। पेट भरने के बाद भी हम खाते गये ....खाना इतना स्वादिष्ट जो था। खाने के बाद हमने मनाया जश्न...खेली अंत्याक्षरी...एक तरफ थे हम और दूसरी तरफ थे हमारे बाबा दादी। एक के बाद एक गानों की कतार... पर आखिरी में हम जीत गये।

इस बीच डाॅ.योगी ने पिछली बार अधिक शुगर और ब्लडप्रशर वाले 12 लोगों को फिर से जांचा परखा....उनकी पर्ची बनायी, दवायें दीं।
चलते चलते बुजुर्गों की तरफ से एक फरमाइश आई कि हमें पिक्चर ले चलो....हम भी मान गये और झट से 7 तारीख का प्रोग्राम बना डाला... सिर्फ 3 दिन बाद ही आ गई 7 तारीख, तब तक पीवीआर में व्यवस्था...उनको पीवीआर तक ले जाने की व्यवस्था और उनके उनके खाने की व्यवस्था कर ली गई और नया साल व हमारी मुलाकात का वार्षिक सम्मेलन संपन्न हुआ 64 लोगों द्वारा फिल्म ‘दिलवाले’ देखकर।
आलेख - रचिता
Friday, January 15, 2016
बस एक मिनट और बुजुर्गों का स्वास्थ्य
6 दिसंबर २०१५
इस बार जब हम वृद्धाश्रम पहुंचे तो बहुत सारी तैयारियों के साथ पहुँचे। हमने तैयार किये थे ढेर सारे एक मिनट वाले खेल। पहुंचते ही बाहर आंगन में हमने जमाई बैठक, लगाई बीच में एक टेबल और शुरू कर दिया खेलों का सिलसिला। हमने बनाये छोटे छोटे बाबा-दादियों केे ग्रुप और फिर खिलाये उनको खेल।

पहला खेल था बोतल में धागे से लटकी चूड़ी पहनाने का खेल, फिर चावल में से मटर अलग करना, स्ट्राॅ से थर्मोकोल बाॅल्स उठाना, फूले हुए गुब्बारों पर नुकीले पेन से नंबर लिखवाना, एक तीली से मोमबत्ती जलाना, टंगट्विस्टर बुलवाना, फोटो में बिंदी लगवाना, सुई में धागा डलवाना, पानी से भरी हुई बाल्टी में रखी हुई कटोरी में सिक्के डालना आदि।
जैसे जैसे शाम गुजर रही थी, हमारे बाबा दादियों की हंसी, ठहाके और उत्साह भी बढ़ रहा था। कुछ हमसे लड़ रहे थे कि एक मिनट अभी पुरा नहीं हुआ है, तो कुछ गिफ्ट में मिलने वाली चाॅकलेट की जिद कर रहे थे। बुढ़ापे में बचपने की सिर्फ बातें सुनी थीं, उस दिन हमने देख भी लीं।
Thursday, December 31, 2015
दुलारी बहिनी की आकाशवाणी से बिदाई
छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के बीच बिलासपुर रेडियो
के आकस्मिक उद्घोषक व कम्पीयर्स

छत्तीसगढ़ के आकाशवाणी केन्द्रों में छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों की अव्वल नंबर की प्रस्तुतकर्ता दुलारी बहिनी यानि पुष्पा यादव 60 साल की हो गईं। एक ऐसी आकस्मिक कंपीयर जिन्होंने 25 साल बिलासपुर में और उससे पहले 5-6 साल रायपुर में छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों की प्रस्तुति में गुजारे।
बिलासपुर आकाशवाणी स्टेशन मई 1991 में शुरू हुआ था, पहली बार जब यहां अगस्त में आॅडिशन्स हुए तो रायपुर के ‘घर आंगन’ कार्यक्रम अनुभवी कंपीयर के रूप में वे यहां से जुड़ी थीं। इस केन्द्र की परंपरा रही है कि जब भी कोई नया अधिकारी यहां आता है, किसी दूसरे केन्द्र या रिटायर होकर जाने वाला होता है तो सारे आकस्म्कि कंपीयर्स व अनाउन्सर्स मिलकर उनका वेलकम करते है, फेयरवेल देते हैं। दरअसल आपस में हम सारे कैजुअल्स एक साथ मिलने का प्रबंध करते हैं, खाते-पीते है....और इतने सारे कलाकारों का जब एक साथ जमघट होता है तो स्वाभाविक है ढेर सारी गतिविधियाँ भी होती हैं। हम साथ में नया साल मनाते हैं, पिकनिक भी जाते हैं और आकाशवाणी के बाहर भी कार्यक्रम करते रहते हैं।
1991 से अब तक न जाने कितने आकस्मिक उद्घोषक व महिला सभा, युवा जगत, किसानवाणी के कंपीयर्स आए, कितनों की शादी हो गई, कितनों की नौकरी लग गई और वे आकाशवाणी छोड़ कर चले गए। ये पहला अवसर था कोई कैजुअल कलाकार अपनी पूरी सेवाएं आकाशवाणी को समर्पित करके रिटायर हो रहा था, तो हमें भी लगा कुछ ऐसा होना चाहिये जो पहली बार हो।

प्रथमेश-सविता का नया नया घर बना था। प्रथमेश मिश्रा पेशे से आर्किटेक्ट हैं और उनकी पत्नी सविता भी आकाशवाणी बिलासपुर में महिला सभा की कंपीयर एक लंबे समय तक रह चुकी हैं। आर्किटेक्ट प्रथमेश ने नई टेक्नाॅलाॅजी के साथ, छत्तीसगढ़ी संस्कृति का समावेश अपने घर में बड़ी ही खूबसूरती के साथ किया है। हमारे बीच की उनकी बहन ऐश्वर्यलक्ष्मी ने उस घर पर लिखी हुई अपनी कविता हमें सुनाई, और बस हमने भी मिलकर तय किया कि इसी अनोखे घर में दुलारी बहिनी की बिदाई पार्टी का आयोजन किया जायेगा। वो कविता आप भी पढ लीजिये तो उस घर का स्वरूप समझ में आ जायेगा.....
भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न दो मंजला बनवायो, न चौमंजला बनवायो, बनवायो एक मंजला,
दिख रौ दो मंजिला मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न कालम खड़े किये, न बीम ढलायो,
नींव पे बनवायो मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न सीमेंट जोड़ायो, न चूना, गारा लगवायो,
मिट्टी से जोड़वायो मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न टाइल्स लगवायो, न सीमेंट छपायो,
मिट्टी से छपवायों मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न पेंट करायो, न चूना पोतायो,
गोबर से लिपायो मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
न लेंटर ढलायो, न टीना लगवायो,
पटौहां लगवायो, खपरा छवायो मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।

भइया देओ हमाओ ब्यवहार, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
भैया कहत हैं, ठंड में कम ठंडा हे, गर्मी में न कूलर चलें न एसी लगे,
बिना पंखों के हवादार है मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
हम कहथ हैं बारिस में टपक को मजा सा इ देहे मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
भैया हमारे प्रथमेश हैं इंजीनियर, उन्होंने बनाया नक्षा, उन्हींने बनवायो इको-फ्रेन्डली मकान,
पूरी कालोनी में अलगई दिखरौ भैया के आलीशान मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
गांव में दाउजू की बखरी सा दिखरौ, शहर में भैया को शानदार मकान।
मम्मी, पिताजी की इच्छा पूरी कर दी भैया ने बनवाके मकान, भैया ने बनवायो ऐसो मकान।
बिना सीमेंट और छड़ों का दो मंजिला मकान, लकड़ी ईंट, चूना, गेरू का उपयोग, खुला मछलीघर, फव्वारा, दरवाजे पर डोरबेल की जगह गाय की घंटी., किचन दिखने में लकड़ी का, पर पूरा माॅड्यूलर, घर के अंदर भी गोबर की लिपाई, सीढियों पर लोक कलाकृति..... हर चीज इतनी सोच समझकर बनाई गई है यहां कि सचमुच दर्शनीय बन गया है ये घर।

हम करीब 50 कैजुअल्स मकान मालिकों की सहमति और सहयोग 18 दिसंबर को इकट्ठे हुए इस घर में जो शहर से लगे हुए तिफरा में यदुनंदर नगर के पीछे की तरफ स्थित है। कुछ ग्रामीण माहौल इस भवन ने निर्मित कर दिया और कुछ हमने तैयार कर लिया.....आखिर दुलारी बहिनी ग्राम सभा, किसानवाणी, घरआंगन जैसे कार्यक्रमों से जुड़ी कलाकार रही हैं। अनीश के नेतृत्व में फरा, बरा झो-झो और हरी चटनी के साथ तैयार मिला जब हम वहां पहुंचे।
पिकनिक से माहौल के बीच हम सब जब साथ मिल कर बैठे, तो यादों का सिलसिला शुरू हुआ। संस्मरणों की फेहरिस्त, दुलारी बहिनी की अद्वितीय कंपीयरिंग की चर्चा, स्टूडियो में मौजूद लोगों को अपनी कंपीयरिंग में जोड़कर गोठ बात करने की चर्चा, अकेले माइक के सामने बैठकर पूरे गांव का माहौल निर्मित करने की क्षमता, एक साथ तीन आवाजों में लाइव कार्यक्रम प्रस्तुत करने की अद्भुत शैली। उनके साथ एक दिन पहले ही नानी बनने की खुशी भी जुड़ी थी जो हम सबके लिये भी इस खास दिन को और खुशमय बनाये हुई थी।
देशभर के किसानवाणी कार्यक्रमों की रिकाॅर्डिंग एक बार दिल्ली मंगवाई गई थी, जिसमें हमारी दुलारी-अंजोरी की जोड़ी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को अधिकारियों ने सर्वश्रेष्ठ माना था।
एक बार मुझे एड्स जैसे गंभीर विषय पर छत्तीसगढ़ी में 30-30 मिनट के 15 कार्यक्रम मात्र 20 दिनों में बनाकर देने की चुनौती मिली थी। बिना स्क्रिप्ट देने के वादे के साथ मैंने ये जिम्मेदारी सिर्फ दुलारी बहिनी का साथ होने के कारण स्वीकार ली।
‘नवा अंजोर’ नामक ये श्रृंखला छत्तीसगढ़ के समस्त केन्द्रों से अब तक 4 बार प्रसारित हो चुकी है। ऐसी हैं हमारी दुलारी बहिनी।
आयोजन आगे बढ़ा...दोपहर का खाना...लाई बड़ी, दही मिर्ची, बिजौरी के साथ्ज्ञ जिमीकंद की सब्जी, टमाटर की चटनी, चैसेला, बोबरा.....पूरा छत्तीसगढ़ी भोज तैयार था।
भोजन के बाद एक पुण्य का काम किया सबने....युवा जगत की आकांक्षा एक एनजीओ से जुड़ी है जो गरीब बच्चों की शिक्षा के लिये 75 किलामीटर लंबा बैनर तैयार कर रहे हैं, जिसमें प्रति हाथ की छाप का प्रिंट लेकर वे 20 रु. एकत्र कर रहे हैं, इस काम की शुरूवात उसने इसी दिन से की और आकाशवाणी के कलाकारों ने गरीब बच्चों के लिये भरपूर योगदान दिया।

बार बार आंखें भर रही थीं दुलारी बहिनी की, वो फूट पड़ी जब हमने उनको झांपी और स्टूडियों में माइक के साथ खींची तस्वीर पर सारे उपस्थित लोगों के हस्ताक्षर के साथ उन्हें भेंट की और वो सिर्फ इतना बोल पाईं ‘‘25 साल भले ही भूल जाऊँ, आज का दिन न भुला पाऊँगी कभी’’।
छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने आये बिलकुल नए कम्पीयर ने दुलारी बहिनी पर एक कविता तैयार की थी...पढ़िए और जानिए कुछ और हमारी पुष्पा दी के बारे में....
मेरी कलम सबसे पहले उनको देती है बधाई,
जिनकी वजह से, जिनके सम्मान में ये शुभ घड़ी है आई।
पर मैं यहाँ क्यों खड़ा हूँ, मुझे क्या मालूम उनके बारे में, मैं तो नया हूँ।
पर हाँ काफी कुछ है कहने को मेरे पास, क्योंकि कई बार मैं आकाशवाणी तो गया हूँ,
और वहां इनकी उपस्थिति और मौजूदगी के काफी सारे सबूत थे।
हर कोना, हर फूल, पेड़-पौधे जो बताने लगे वे मेरे लिये बहुत थे।
तो वहीं से आप सबके लिये अनुभव के कुछ फूल लाया हूं,
और बातें उनकी लाया हूं जो खुद फूल की पर्यायवाची हैं।
अपने कार्यक्रमों में दो-दो भूमिकाएं खूबसूरती से निभाती हैं,
जिन्होंने रायपर के ब्राम्हणपारा से अपनी शुरूवात की,
और जिनकी कर्मभूमि आज बिलासपुर है।
25 वर्षों के अनुभव का सागर जिनके पास भरपूर है,
सरलता जिनकी पहचान है, सादगी जिनकी पहचान
सबको साथ लेकर चलना, इतना नहीं आसान।
जिंदगी के सबसे कठिन वक्त में भी अपने आप को संभाला है,
इनकी दो संतान ही इनके लिये मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और शिवाला हैं।
बेटी में इनकी ‘श्रद्धा’ है, ‘आकाश’ को बेटा बनाया है,
1991 से लगातार बने रहकर अपना अलग ही अस्तित्व बनाया है।
संघर्ष इनसे परिभाषित होता है, परिवार को भी सही शिक्षा, संस्कार और आयाम दिया है
तभी तो ईश्वर ने उन्हें नानी बनाया और खूब सारा व्यायाम दिया है।
घर पर आप इन्हें हरदम हिन्दी बोलते ही पाओगे,
पर माइक पर छत्तीसगढ़ी सुनकर आश्चर्य में पड़ जाओगे।
दो किरदारों को साथ लेकर चलती हैं,
मिलें किसी से अगर तो सहज भाव से मिलती हैं।
कहते हैं ‘आवाज़ कभी मरती नहीं’,
हजारों लाखों श्रोताओं के बीच आप हमेशा दुलार पाओगी।
जिंदगी में हर सुख, आनंद और उत्साह लेकर आप आनंद मंगल गीत गाओगी।
आप अपने नाम के अर्थ को हमेशा खुशियों में बिखेरते रहना,
और जरूरत पड़े मुझ जैसे गरीब की आपको तो हमसे प्लीज़ मिलते रहना।
प्रतीष शर्मा
18.12.15
Tuesday, November 24, 2015
संवेदना 10- नवम्बर यानि दीवाली
बुज़ुर्गों में भी फुलझड़ी, अनार देखकर जागा बचपना......
दीवाली का नाम सुनते ही ज़ेहन में आती है ढेर सारी खुशियां....अपनों के साथ हंसी-मज़ाक....दादी-नानियों के किचन से आती पकवानों की खुशबू.... आंगन सजाती रंगोली.....चौखट पर नया तोरण....दियों की लंबी कतारें.... आतिशबाज़ी, लक्ष्मी मैया की पूजा....और ढेर सारे उपहार.....
दीवाली का नाम सुनते ही ज़ेहन में आती है ढेर सारी खुशियां....अपनों के साथ हंसी-मज़ाक....दादी-नानियों के किचन से आती पकवानों की खुशबू.... आंगन सजाती रंगोली.....चौखट पर नया तोरण....दियों की लंबी कतारें.... आतिशबाज़ी, लक्ष्मी मैया की पूजा....और ढेर सारे उपहार.....
हमने इस बार सोच लिया कि नवम्बर महीने का पहला रविवार दीवाली का त्योहार कल्याण कुंज आश्रम में बुजुर्गों के साथ मनायेंगे। खुशियां बांटने से बढ़ती हैं...तो अपनी खुशियां बांटने हम पहुंच गये अपनों के बीच...
कुछ दिन पहले जब हमारे कुछ साथी आश्रम गये थे बाबा-दादियों से मिलने, तो उन्हें पता चला था कि कुछ बाबा-दादियों की तबियत सही नहीं है...तो हमने सोचा कि क्यों न इस बार दीवाली के उपहार स्वरूप हम उन्हें दें अच्छी सेहत का तोहफा। इस उपहार को साकार करने के लिये हम मिले डाॅ.अंशुमन जैन से .....आप होम्योपैथी डाॅक्टर हैं....जब हमने उनसे बात की और अपना इरादा बताया तो वे झट से तैयार हो गये और अपना सामान लेकर खड़े हो गये.....कहा....'चलो'.....

उन्हें लेकर हम पहुंचे आश्रम....डाॅक्टर साहब को देखते ही सभी के चेहरे खिल उठे और लंबी लाइन लगाकर खड़े हो गये अपनी बारी का इंतजार करते. डाॅक्टर साहब भी लग गये उनके मर्ज़ को पकड़ने और उन्हें दवाइयां देने में....
और इन सबके आने के बाद तो जैसे आश्रम का माहौल ही बदल गया। इस बार हम हर बार की तरह एक जगह नहीं बल्कि अलग अलग ग्रुप में बंट कर काम कर रहे थे।
इतने में एक दादाजी ने अपना जादुई पिटारा खोला और उसमें से निकला ढोलक और मंजीरा....बस फिर क्या था....एक के बाद देवी भजन....शिरडी वाले साईं बाबा, दमादम मस्त कलंदर, भर दो झेाली मेरी या मोहम्मद, चलो बुलावा आया है....ऐसे गीतों से पूरा आश्रम गूंजने लगा....
अब
बारी थी पटाखों की....सभी आ गये आंगन में....और सिलसिला शुरू हुआ आतिशबाजी का....हर
बाबा दादी मगन थे अपनी अपनी फुलझड़ी जलाने में.....कोई कागज जलाकर कहता....इससे
अनार जलाते हैं....तो कोई फुलझड़ी खत्म होने से पहले अपनी चकरी जलाने की जद्दोजहद
में लगा था....कोई दादी फुलझड़ी जलाकर दीवाली की बधाइयां दे रही थीं....तो कोई
बाबाजी दूसरे बाबाजी को संभल कर पटाखे जलाने की हिदायत दे रहे थे....
पूरा
आश्रम हंसी और ठहाकों से मुस्कुरा रहा था.....और सोच रहा था....'ये पल यहीं थम
जाये'....'ऐसा उत्सव और माहौल आश्रम में आज तक नहीं हुआ'‘एक बाबाजी के ये लफ्ज़ थे....ढेर सारा प्यार, आशीर्वाद और खुशियां लेकर हम वहां से विदा हुए.....
आलेख:
रचिता टंडन
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