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Thursday, July 23, 2015

संवेदना 5 - वृद्धाश्रम में नाटकमय हुआ माहौल

7 जून 2015

लिब्रा वेलफेयर सोसायटी का  एक प्रयास, कल्याण वृद्धाश्रम में रहने वाले तकरीबन 70 महिला पुरुष बुजुर्गों के साथ महीने में एक दिन दो घंटे का समय व्यतीत करना, उनकी समस्याओं को समझना, उनके दिल को छोटी छोटी खुशियां देना। फरवरी के महीने से ये सिलसिला शुरू हुआ था। 4 बार उनसे मिलने के अलावा बीच बीच में भी हम उनकी समस्याओं के समाधान के लिये उनके पास जाते रहे। लेकिन अब वे बुजुर्ग भी पहले रविवार का इंतजार करने लग गये हैं हमसे मिलने के लिये।
जून के पहले रविवार को भी शाम 4 बजे पहुंच गई हमारी फौज।  आज इस फौज में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय के चंद नये चेहरे भी मौजूद थे। दो दिन पहले ही 5 जून को पर्यावरण दिवस गुजरा था जिसमें इन नये चेहरों ने अनुज के निर्देशन में नगर में एक नुक्कड़ नाटक किया था और उसके पहले सुनील के निर्देशन मे अग्रज नाट्य दल की टीम पुणे में अपने नाटक ‘खबसूरत बहू’ का नाट्य प्रदर्शन करके लौटी थी। सभी उस रंग में रंगे थे।
सुनील ने आज बुजुर्गों की नाट्य-कक्षा ले ली। कुछ पुराने नाट्य गीतों जैसे ‘ एक थाल मोतियों से भरा, सबके सिर पर औंधा पड़ा’, ‘मैं हूं मोती नाला’ आदि को ग्रुप के लोगों ने सामूहिक रूप से गाया और बुजुर्गों को सिखाया। वाह...उनको भी बहुत मजा आया। एक बुजुर्ग ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती’। हमारी बातें सुनकर आपको भी जरूर आनंद आया होगा। एक महिला का कहना था ‘इतनी उम्र में भी हमने ऐसा अनुभव आज तक नहीं पाया’।
इस दौरान हमारी महिला साथियों का काम एक कोने में चुपचाप चल रहा था। वे प्याज, टमाटर, मिर्च आदि काटने में मषगूल थीं। एक तरफ दोने रखे थे और मिक्षचर, मुरमुरा, चना, मूंगफली, कुछ चटनियां आदि सामान इनके चारों ओर रखा हुआ था। कुल मिलाकर भेल बनाने का कार्यक्रम चल रहा था।
हमने सब बुजुर्गो की जन्मतिथियां जाननी चाहीं तो किसी को पता नहीं थीं और किसी को याद नहीं थीें तो इस महीने से हमने एक काम और शुरू किया। हर महीने एक केक लाकर एक महिला व एक पुरुष बाबा-दादी के साथ उस महीने हमारे ग्रुप के जिस सदस्य का जन्मदिन उस महीने में होगा उसके साथ उनको केक कटवाने का काम। दूसरे ही दिन मेरा जन्मदिन था...मेरे लिये सरप्राइज था ये....दो बुजुर्गों के साथ मैंने केक काटा, सबने गाना गाया, केक खाया। बड़ों से आशीर्वाद लिया, छोटों को दिया।
पर्यावरण नाटिका 
डॉ.योगी द्वारा चिकत्सा सुविधा 
ड्रामा ट्रेनिंग खत्म होने तक भेल वितरण शुरू हो गया और अनुज के निर्देशन में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय  के छात्रों ने पर्यावरण नाटिका का प्रदर्शन वहीं पर आरंभ हो गया। भेल के साथ साथ नाटक का आनंद। बुजुर्गों के साथ हम सबको भी मिला आनंद, साथ ही हम पर बरसा ढेर सारे बाबा दादियों का एक बार फिर से आशीष। एक महीने के लिये उर्जा एकत्र करक, उनसे अगले महीने फिर से आने का वादा करके, हम सबने वहां से विदाई ली।

कुछ बुज़ुर्ग जिनसे हम हर महीने मिलने जाते हैं.......

 

 

  



 








Sunday, July 12, 2015

संवेदना 4- शादी गुड्डे गुडि़यों की

फिर याद किया बचपन
3 मई 2015

3 मई 2015 को खास दिन था जिसकी तैयारी लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के सदस्य बड़े जोर शोर से कर रहे थे क्योंकि  इस दिन छोटे बच्चों के साथ मिलकर गुड्डे गुडि़यों का ब्याह रचाया जाना था और जगह थी वृद्धाश्रम।
कल्याण कुंज वृद्धाश्रम के निचले भाग में बुजुर्ग पुरुष और ऊपरी हिस्से में महिलायें हैं। अक्सर हमने देखा है कि महिलायें मुखर हुआ करती हैं, पर पुरुष चुपचाप से रहते हैं। जब बारातियों के स्वागत की तैयारी करके आश्रम पहुंचे तो मन उत्साह से भर गया क्योंकि वहां बुजुर्गों ने विवाह की बहुत सारी तैयारी करके रखी हुई थी। गुड्डे गुडि़यों के छोटे छोटे पीढ़े 50-50 रु. में एक दिन पहले ही मंगाये जा चुके थे, उन्हें रंगा जा चुका था। गुडि़या के जेवर, कपड़े, पीले चावल, परछन का सामान, सब तैयार था। अरुण, अनुज, प्रषांत, रुनझुन ने मंडप सजाया। इसी बीच अभिषेक की ढोलक और अंतरा के गीत नृत्य ने बिलकुल शादी का माहौल तैयार कर दिया। बुजुर्ग महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ बन्ना बन्नी गीत गाये।

तब तक काॅलोनी और अरुण के घर से आये बच्चों ने ढेर सारे बच्चे इकट्ठे कर लिये थे। सबने मिलकर निकाली बारात। प्रषांत, अनुज, अभिषेक के गीत और अजय की ढोल पर थाप,

बच्चे तो बच्चे आश्रम के बुजुर्ग भी मगन होकर नृत्य करने लगे। उनमें से कई लागों ने बचपन में हर साल अक्ती यानि अक्षय तृतीया पर इस तरह के आयोजनों में हिस्सेदारी के किस्से भी हमें सुनाये। इस बार रुनझुन की दादी भी हमारे साथ थीं जो लगातार हमारा मार्गदर्शन कर रही थीं।
बारात जब आजाद नगर की गली से निकली तो इतनी शानदार थी कि काॅलोनी वासी छतों पर आ गये, सड़क चलते लोग रुककर आनंद लेने लगे और घराती बने हमारे साथी भी नाचने में शामिल हो गये बारात में।
नाचते गाते बाराती जब लौटे तो रुनझुन, अंतरा, प्रमिला और मैंने द्वार-चार किया। बुजुर्ग महिलाओं ने परंपरागत गाली गाई। मजा तो तब आया जब प्रषांत ने द्वार-चार के समय द्वार पर धरना दे दिया कि हमारा दूल्हा तो तभी अंदर आयेगा जब उसको कार मिलेगी। उसे दहेज लेने के जुर्म में पुलिस को बुलाने की धमकी दी गई तब वो माना और अंदर आया। मजाक मजाक में ही सही दहेज न लेने-देने की बातें भी वहां संकेतात्मक रूप् में की गईं। फिर दूल्हे दुल्हन के फेरे हुए, उस समय भी नोंक झोंक वाले गीतों का सिलसिला जारी रहा। बारातियों को छत्तीसगढ़ी व्यंजन फरा, गुलगुला के साथ चटनी, बरफी, पोहा आदि का नाश्ता  करवाया गया। ये एक ऐसा अवसर था जिसमें वृद्धाश्रम के सभी सदस्यों ने भाग लिया। अक्सर वो चेहरे जो नवांगतुकों से ही नहीं अपने साथियों से भी बातचीत करने में असहज हो जाते थे, आज खिले हुए थे। घरों में मनाये जाने वाले त्योहार यहां भी इतने उत्साह से मनायेंगे, ये वो सोच भी नहीं सकते थे।
ब्चपन एक बार फिर हमने आज यहां जिया है, जब ऐसा एक बुजुर्ग ने हमसे कहा तो लगा कि हमारा प्रयास सफल हुआ। उन्होंने कहा हमें अगलग कार्यक्रम का इंतजार रहेगा। ये इंतजार हमें भी रहेगा।

आलेख: मीनू सिंह