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Friday, October 30, 2015

संवेदना 8 - जिज्ञासा, अचम्भे और उत्साह से लबरेज़ बाबा-दादियों के साथ बीते पल

6 सिंतबर 2015
बुजुर्गों की मॉल और पीवीआर यात्रा 
सिंतबर का महीना शुरू हो चुका था....किसी को इंतजार था बारिश  का, तो किसी को गरम गरम भुट्टों का, कहीं शिक्षक दिवस और गणेशोत्सव की तैयारी चल रही थी तो कहीं आने वाली परीक्षाओं की, पर हमें तो बस इंतजार था पहले रविवार का। यूँ तो हर बार रहता है पर इस बार कुछ ज्यादा ही था क्योंकि इस बार हमारा प्रोग्राम भी तो बहुत खास था। इस बार हम सारे बाबा-दादियों को पिक्चर दिखाने जो ले जा रहे थे। शो का समय था 10 से 1 बजे का और हमारे बाबा दादी लोग इतने उत्साहित थे  की वे सुबह 7 बजे से ही नहा धो कर, नये कपड़े पहनकर हमारा इंतजार कर रहे थे। हम अपनी आदत से मजबूर फिर थोड़ी देर से पहुंचे, पर इस बार हमें डांट भी पड़ी.....लेकिन इस डांट में अपनेपन की गंध थी.....हमने उन्हें थोड़ा बहलाया, फिर फुसलाया, फिर मनाया और फिर उन्हें लेकर हमारी तकरीबन 12 गाडि़यों का काफिला निकल पड़ा मैग्नेटो माॅल की तरफ।

अविनाश और उसके दोस्तों ने समय से सबको माॅल पहुंचा दिया। वहां माॅल के कर्मचारियों के साथ हमारे ग्रुप के बहुत सारे मेम्बर्स दादा-दादियों के स्वागत के लिये पहले से पहुंचे हुए थे। सभी ने एक एक दादा-दादी का हाथ थामा और ले चले उनको पीवीआर की तरफ। माहौल कुछ ऐसा था कि दादा-दादी अचंभित इतनी बड़ी बिल्डिंग देखकर...कई सवाल उनके जेहन में....और उनके जवाब हमारी ज़बानों पर...पूरा माॅल घूमते हुए जब हम उन्हें लेकर पीवीआर  पहुंचे तो फिल्म शुरू होने में कुछ ही समय बचा था....पहुंच गये हाॅल के अंदर....सारे दादा दादी अपनी पसंद और सुविधानुसार जगह पर बैठ गये....पिक्चर थी ‘‘मांझी’’


शुरू में मेरे बगल में बैठी एक दादी बोलती हैं ‘हाय राम इतना बड़ा टीवी‘ तो दूसरी दादी बोलती हैं मुझे पूरे 35 साल हो गये हॉल में पिक्चर देखे हुए। जैसे जैसे पिक्चर बढ़ती गई, सभी के हाव-भाव बदलते रहे। कुछ हंसे, कुछ रोये, कुछ गुस्साये तो कुछ सिर्फ मुस्कुराये। इंटरवेल हुआ...तो याद आई पाॅपकाॅर्न की...हम भी गये भागते हुए उनकी इच्छा पूरी करने...‘वाह! मज़ा आ गया‘...बस यही तो सुनना था हमें...और यकीन मानिये उस दिन सभी ने यही कहा। पिक्चर फिर शुरू हुई और हमारे बाबा दादी फिर खो गए उसमें। अब आप सोच रहे होंगे पिक्चर खत्म...किस्सा खत्म....पर पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त...यकीनन पिक्चर ज़रूर खत्म हुई पर किस्सा नहीं।
 

रामा मैग्नेटो वालों ने सभी के लिये लंच का इंतजाम कर रखा था। तो जैसे  ही हम हाॅल से निकले, सीधे फूड कोर्ट पहुंचे। पूरा फूड कोर्ट महक रहा था गज़ब की सुगंध से। सामने टेबल पर गरम गरम पनीर और आलू गोभी की सब्जी, दाल, नान, तंदूरी रोटी, सलाद, चावल, रायता और ढेर सारे गुलाब जामुन रखे थे....देखते ही हमारे मुंह में भी पानी आ गया। दादा-दादियों को बिठाया और हम सब खुद लग गये उनको परोसने और खिलाने में। रामा वालों ने कम मसाले और कम मिर्च का खाना बनवाया था बाबा दादियों की सेहत का ख्याल रखकर...और सभी ने बहुत स्वाद ले लेकर भरपेट खाया और ढेर सारा आशीर्वाद भी दिया।

अब बारी थी वापस जाने की.....तो कहते हैं ना बुढ़ापे में बचपन लौट आता है...वैस ही हुआ...कुछ ने कहा हमें अभी नहीं जाना....तो कुछ ने कहा हमें अभी और घूमना है...हमारे साथियों ने फिर एक बार बागडोर संभाली और ले गये उन सबको अलग अलग ग्रुप में माॅल घुमाने...माॅल घूमते वक्त उनके जिज्ञासा भरे प्रश्न और उन सबके चेहरों के बदलते हाव भाव....उफ़़्.... हमारे लिये भी कभी न भूलने वाले पल थे.....आधे घंटे बाद सभी एक जगह इकट्ठे हुए तो देखा अविनाश और उसके दोस्त फिर तैयार थे अपनी अपनी गाडि़यां लेकर...सभी बाबा-दादियों को बिठाया और सुरक्षित उन्हें वापस वृद्धाश्रम छोड़ दिया...सभी खुश थे, सभी कह रहे थे ...‘बहुत दिनों बाद इतना आनंद आया‘ और पूछ रहे थे....‘फिर कब?' हम भी अगले महीने आने का वादा कर वहां से विदा हुए।

लेकिन अगला महीना शुरू हो उससे पहले ही आ गया गणेषोत्सव।  वृद्धाश्रम से हम सबके पास व्यक्तिगत रूप् से फोन आए उनके गणशोत्सव में एक दिन शामिल होने के लिये। उनकी दिली इच्छा का ध्याान रखते हुए उस दौरान हम सब एक बार फिर उनके आश्रम पहुंचे और एक शाम फिर उनके साथ बिताई पूजा अर्चना में शामिल होकर।     : रचिता टंडन 
 

Monday, August 10, 2015

संवेदना 6 - पिछले 6 महीनों का सफर

3 जुलाई 2015
फरवरी से जुलाई तक का सफर....
हर महीने का पहले रविवार बुजुर्गवारों का साथ इंतजार...बार-बार..
आज हम फिर हैं उनके साथ...
 हमारा उनसे बढ़ता लगाव, उनका हमसे बढ़ता प्यार...लगातार.... अपरंपार.....


पिछले पाँच महिनों में हमने इन बुजुर्गों को पिकनिक ले जाकर घुमाया उनके साथ अक्षय तृतीया पर गुड्डे - गुड़िया का ब्याह रचाया, होली के अवसर पर नगाड़ों के साथ फाग उत्सव मनाया, नाटक दिखाया, उनसे गाने गवाए, खेल खिलवाए.... और आज इन सब अवसरों पर खींची गई तस्वीरों का प्रोजेक्टर पर उनके साथ प्रदर्शन किया जाने वाला है।

हम 4 बजे वहाँ पहुँचे उसके पहले दरी बिछाकर सब तैयार होकर हमारे इंतजार में बैठे हुए मिले। अब तो वे हमें छेड़ने भी लगे हैं।
‘कइसे नोनी आज बड़े उदास दिखत हस‘
‘का बात हे आज का कराबो हमन ला‘
‘अब 1 महिना के इंतजार नई होवत हे बाबू, थोड़किन जल्दी जल्दी आये करव ना‘
उनकी ऐसी बातों से हमारा जोश और बढ़ जाता है।


प्रोजेक्टर लगने की प्रक्रिया के दौरान केक काटने का कार्यक्रम किया गया एक बाबा, एक दादी जिनको अपने जन्मदिवस की तिथि नहीं मालूम है उनको बुलाकर हमने उनसे केक कटवाया उनका जन्मदिन गीत गाया और सबको केक बँटना शुरु किया हमारी बच्चियों मीशा और खुशी ने।
उनकी जिज्ञासा प्रोजेक्टर देखकर हो रही थी कि 'सिनेमा दिखाबो का' तो हमने कहा 'इंतजार करिये आज के हीरो हीरोइन आप ही लोग हैं।'
फिर सिनेमा शुरु हुआ। अपनी और साथियों की तस्विरों को देखकर वे बहुत खुश थे और उनके चेहरों कि बदलती रंगत को देखकर हम। एक - एक फोटो पर उनके कमेंट्स हमारे ग्रुप के साथ उनकी और नजदीकी बढ़ा रहे थे।


इतनी देर में पहले से निर्धारित किया हुआ एक चाट का ठेला आश्रम के कैंपस में लगवा दिया गया फोटो प्रदर्शन सेशन के बाद चाट गुपचुप खाने के लिए सबको आमंत्रित किया गया पहले तो वे हिचकिचाते -शर्माते रहे किसी ने कहा 'हमारे दांत नहीं है कैसे खाएं' किसी ने कहा 'मन तो बहुत है पर पेट न खराब हो जाये'. हमने बताया बिना मिर्च का अच्छे पानी का इस्तेमाल करके आप लोगों के हिसाब से सब तैयार करवाया गया है. कुछ लोगों ने शुरु किया फिर तो लाइन लग गई।


'बरसों बाद चाट का स्वाद लिया बिटिया तुम सब के कारण मजा आ गया'
'हम तो यहां जब से आये हैं पहली बार चाट खाने को मिली
सब लड्डू, पूड़ी, मिठाई दे जाते हैं यहां तुम लोग बहुत अच्छा
सोचते हो.'
क्या ऐसे वाक्य हमको खुश करने के लिये और हमारे उद्देश्य को पूरा करने के लिए काफी नहीं थे.
छोटी-छोटी सी खुशियां और उनसे बड़े-बड़े से आशीर्वाद.....
संवेदना कार्यक्रम का यही है प्रयास......  
जो चलता रहेगा लगातार.....






Friday, July 10, 2015

सम्वेदना 3 - बुजुर्गों के साथ पिकनिक

हमारी यादों में एक और महत्वपूर्ण दिन का अंकन......

5 अप्रेल 2015


सुना है जिंन्दगीं का असली आनंद सफर करने में आता है। सफर की शुरूआत एक अनसुलझी पहेली की तरह होती है, जो कि सफर के दौरान सुलझती जाती है  साथ ही दुखी और थका हुआ मन हर पल उत्साह से लबरेज होता जाता है, खुशियों से भरता जाता है। कुछ इसी तरह के सफर का आनंद रविवार 5 अप्रेल को बिलासपुर  के कल्याण कुंज वृद्वाश्रम के 40 वृद्धों ने उठाया। 

हर महीने का पहला रविवार इन वृद्धों के लिए भी इंतज़ार का होता है और लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के सदस्यों के लिये भी, क्योंकि ये दिन हमारे आपस में साथ बिताने का दिन होता है। इस बार सीनियर सीटिजन को इस दिन मदकूदीप की सैर करवाई जानी थी।
शिवनाथ नदी 
मदकू दीप में पुरातात्विक अवशेष
शनिवार की रात को ही हमने योजना का प्रारूप तैयार कर लिया थी। बस अब देर थी कि कब सूरज अपने रंग में आए और हम सब मदकूदीप की सैर को निकले । व्हाट्सएप पर संवेदना ग्रुप में सबको समय पर पहुंचने की हिदायत दे दी गई थी। । कोई पानी के कंटेनर ले के आ रहा था, तो कोई बिछाने के लिए चटाई के साथ ही पत्तल व दोने के पहुंच रहा था। आखिरकार आश्रम के समीप हम कुछ लोग दिए गए वक्त से पहले पहुंच गए, क्योंकि हमें पूरी तैयारी जो करनी थी। हम तैयारी में ही लगे थे कि उसी समय हमारी बस भी ठीक वक्त पर पहुंच गई। जब बस पहुंची तब करीब सुबह के 8 बजकर 30 मिनट हो रहे थे।

हम लोग जरूरत की समाने जैसे खाने के डब्बे व पानी के कंटेनर, चटाई इत्यादि समान बस में चढ़ाने लग गए। हमने तो सोचा था कि लगभग 70 बुजुर्गों के साथ सफर की शुरूआत समय पर तो ही नहीं सकती, 9 बजे निर्धारित समय था पर हमारी गाड़ी 10 बजे से पहले तो निकलेगी ही नहीं। लेकिन जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ, जितने उत्साहित हम इस सफर को लेकर थे, उससे लाख गुना ज्यादा उत्साहित आश्रम के वृद्ध लोग थे। बस के पहुंचते ही सभी वृद्ध अपने-अपने जरूरत की समान जिसमें, दवाईयां, लाठियां व धूप को देखते हुए गमझे इत्यादि एक थैले में समेठ कर बस की ओर दौड़ पडे़ अपनी सीट पाने के लिए। हम बस में दरी, व खाने-पीने की जरूरी की समाने चढ़ाते उससे पहले ही सभी बुजुर्ग अपनी अपनी सीट पर बैठ चुके थे। हमारे कुछ लोग नहीं पहुंचे थे पर वे सब समय के ज्यरत से ज्यादा पाबंद निकले। मजा तो यहीं से आना शुरू हो गया।

युवा सदस्य
कुछ साथी अब तक नहीं पहुंचे थे। वक्त का तकाजा देख हमने देरी ना करते हुए अपने मंजिल की ओर अग्रसर होने का फैसला लिया। सुबह से टकटकी लगाए बुर्जुगों के सफर की शुरूवात मसानगंज स्थित वृद्धाश्रम से हुई। बस रवाना हुई, बस के अंदर का नज़ारा अद्भुत था। ऐसा लग रहा था मानो छोटे-छोटे बच्चे पहली बार स्कूल बस में बैठ स्कूल की ओर जाने को। वृद्धों के खुषी देखते ही बन रही थी, मानो वह आश्रम की चारदीवारी को लांघ कर खुले आसमान में उडने जा रहे हैं। हमारी बस अब अपनी मंजिल की ओर निकल पड़ी थी। जैसे-जैसे वह शहर से बाहर निकलती गई वैसे-वैसे अपनी रफतार पकड़ती गई। बस के चलते ही खिड़कियों से आती तेज हवा जब झुर्रियों भरे चहरे को स्पर्श करती तो बुजुर्गों के चेहरों पर एक अनोखी चमक दिखाई देती और वह चमक उनके

प्रफुल्लित होने का हमें संकेत देती। बुजुर्गों के अनुभव व लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के युवाओं के जोश के संग मनोरंजन के लिए बस में ही अंताक्षरी शुरू की गई। इस दौरान युवाओं ने बुजुर्गो की इच्छाओं के अनुरूप सफर को सुहाना बनाने के लिए भक्ति से ओत-पोत गीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। करीब घंटे भर की यात्रा के बाद सभी मदकूदीप पहुंचे।

बिलासपुर से 44 किमी दूरी पर स्थित यह स्थान छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों में से एक है जो कि शिवनाथ नदी के शांत जल से घिरा एक द्वीप है। हर साल फरवरी माह में होने वाले ईसाई मेले के कारण से यह स्थान प्रसिद्ध है। पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन के दौरान यहां कृष्ण, उमा व गणेश की प्राचीन मूर्तियां पाई गईं, साथ ही खुदाई के दौरान प्राचीन काल के 19 शिव मंदिरों का पता चला। इस द्वीप का नाम मदकू ऋषि के नाम पर रखा गया है।

आखिरकार हम सभी मकदूदीप पहुंच चुके थे। अब सूरज अपने पूरे रंग में था सर के ऊपर तेज धूप थी और हम एक दूसरे से एक गिलास ठंडे पानी की मांग कर रहे थे। सूरज की तपिष को देखते हुए सब पेड़ों की छांव में जा छिपे और वृद्धों की सहूलियत के लिए हमने उसी स्थान पर अपना बसेरा बना लिया। युवकों ने वहां दरी बिछाई, बस से सारा समान उतारा। वृद्ध लोग भी एक-एक कर किसी ना किसी का सहारा लेते हुए बस से नीचे उतरे। और पेड़ों की शरण में जा कर ठंडक ढूंढने का प्रयास करनेे लगे।
ठंडे पानी के 12 बड़े बड़े कैन राहत के सबसे बड़े साधन थे। गर्मी इतनी थी कि हमने देरी ना करते हुए बुजुर्गों को लीची के जूस, तरबूज व ककडी बांटी। हमने बातों ही बातों में बुजुर्गो का मनोरंजन करना प्रारंभ किया। इस मनोरंजन के दौर को आगे बढ़ाने के लिए सभी को गोल बिठाया गया. और इसकी टोपी उसके सर गेम शुरू किया गया। जिसमें सभी बुजुर्गों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। साथ लाए गए ढ़ोल, मंजीरे के सहारे बजते धुनों के साथ ही टोपी एक सर से दूसरे सर घूमती फिरती। जहां संगीत रूकता उस समय टोपी जिसके सर पर रहती वह अपनी इच्छानुसार भजन, चुटकुले, व संगीत गाकर खेल को आगे बढ़ाता। जहां कुछ बुजुर्गों ने उत्साह पूर्वक इस खेल में भाग लिया, तो वहीं कुछ
शरमाए, तो कुछ हिचकिचाएं, लेकिन धीरे-धीरे सभी ने एक-एक कर खेल का जमकर आनंद उठाया।

 इसके बाद हमारे साथियों ने सामूहिक गीतों की महफिल जमानी शुरू कर दी। ये सुन-देख कर वृद्ध लोग और भी उत्साहित हो गए। एक पल तो ऐसा आया जब गाना सुनकर एक वृद्ध महिला के पैर थिरक पडे़। इसे देख हमारा जोश  और भी बढ़ गया और हमारे कुछ साथी भी उनका साथ देते हुए कदम ताल मिलाते हुए गुजरात का पारंपरिक गरबा नृत्य व अन्य डांस करने लगे।


कुछ ही दूरी पर स्वयंसेवी संघ के नेतृत्व में दो दिवसीय कार्यशाला का  आयोजन हो रहा था। युवा व वृद्धों के इस तालमेल को देख वह आश्चर्य चकित हो गए. उनके मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि भला यह किस तरह का कार्यक्रम हो रहा है। वह अपने आप को रोक ना पाए और हमारे पास आकर पूछने लगे। हमने भी निःसंकोच होकर उनके सारे प्रश्नों का एक-एक कर जवाब दिया। अब बुजुर्ग अपने अंदाज में भजन गाजे-बाजे के साथ शुरू कर चुके थे। और हम उनके खाने की तैयारी में व्यस्त हो गए।

सभी को स्वादिष्ट भोजन कराया गया। धूप की तपिश जब थोड़ी कम हुई, सब मदकूद्वीप के मनोरम सौंदर्य को देखने निकल पड़े. कोई नदी के किनारे चल पड़ा, तो कोई मंदिरों में पूजा पाठ करने में लग गया। कुछ की रुचि खुदाई में  निकले शिव मंदिरों में थी। संध्या हो चली थी और हमारे सफर का अंत होने का समय भी आ गया। हमारी बस वापस अपने आशियाने की ओर रवाना हुई. करीब 4 बजकर 30 मिनट पर सभी वापस वृद्वाश्रम पहुंचे.

सभी ने सफर के हर पल का मजा लिया. आश्रम पहुंचते ही उन सभी वृद्धों  को जो  लोग इस सफर में नहीं गए थे, बाकी लोग उत्साह पूर्वक अपने सफर के अनुभव बताने लगे। इस मौके पर लिब्रा वेलफेयर सोसाइटी के लोगों ने बुजुर्गों का भरपूर साथ दिया और उनके सफर को एक अद्भुत अनुभव का पात्र बनाया। हम सबकी सबकी यादों में एक और महत्वपूर्ण दिन अंकित हो गया।

आलेख - लकी यादव
Libra Welfare Society
              

Thursday, July 9, 2015

संवेदना - साफ़ सफाई अभियान

15 मार्च 2015

संवेदना कार्यक्रम के तहत जब हमारे समूह  के लोग दो बार वृद्धाश्रम गए तो उनके कमरे की खिड़की के पास बदबू के कारण खड़ा होना दूभर हो रहा था.....जब हमने खिडकियों के बाहर देखा तो दिखा कचरे का बड़ा सा अम्बार....सचमुच  सबका मन खराब हो गया....उनके स्वास्थ्य की सबको चिंता हुई...आपसी राय बनी 15 तारीख को सुबह हम सफाई करने के लिए झाड़ू, फावड़ा जैसे ढेर सारे सामान के साथ पहुँच गए डॉ योगी, डॉ.राजेश टंडन, अंशुल प्रशांत, रचिता, लक्ष्मी, मीनू और अभय.

हमें इस काम के लिए आया देखकर वहां के बुजुर्गों ने ये काम करने से मना  किया. और बताया कि पार्षद से अनेक बार चर्चा हुई है, वो एक दो दिनों में सफाई करवाने वाले है. एक दादाजी ने तो पार्षद को फोन लगवाकर उनसे हमारी बात भी करवाई. तब तक मैदान में कूद चुके थे हमारे साथी. गन्दगी कुछ ज्यादा ही थी. स्वच्छता अभियान के नगर निगम के कर्मचारी उसी समय गाड़ी और ट्रेक्टर लेकर पहुंचे..पर उनके साथ एक भी लेबर नहीं था..इसलिए बड़ी सी गाड़ी से जितना कूड़ा उठाया जा सकता था उठाकर जा रहे थे, हमने उनसे पूछा इधर गली की सफाई? जवाब मिला वहां गाड़ी नहीं जा सकती और लेबर हमारे साथ रहते नहीं....हमारी समझ में आ गया की स्वच्छ भारत अभियान में सफाई वही हो सकती है जहाँ बड़ी गाड़ी पहुँच सके...हमने पार्षद को फिर से फोन लगाया, उनको ये समस्या भी बताई...उन्होंने  दूसरे दिन पूरी सफाई करवाने का पक्का आश्वासन दिया....हमने भी उस समय आने का वादा किया और बढ़ चले पास के सब्जी बाजार की ओर....



हमारे आज के काम में प्लास्टिक थैलों के विकल्प पुराने कपडे के थैले और अखबार के पैकेट्स बांटकर जागरूकता फैलाना भी शामिल था. ये काम पिछले 2 सालों से किया जा रहा है. सोसाइटी द्वारा पुरानी साडि़यो. और चादरों के थैले और अखबार के पैकेट्स बनवाए जा रहे हैं, कुछ महिलाओं  को इस काम के लिए रोज़गार भी दिया जा रहा है..
दूसरे दिन सुबह पार्षद साहिब ने अपना वादा निभाया....बुजुर्गों के चेहरों की  खुशी ने हमको कितना सुकून दिया ये हम शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते....एक बुजुर्ग ने हमारे एक सदस्य का हाथ पकड़ लिया और रोने लगे....सिर्फ इतना कह पाए कि हम कितने दिनों से कोशिश कर रहे थे...आपने एक दिन में करवा दिया.....हमको लगा हमारा संवेदना शीर्षक प्रोजेक्ट सार्थक होना शुरू हो चुका है....


LIBRA WELFARE SOCIETY



Wednesday, February 4, 2015

संवेदना1 .....एक नया प्रयास....

वृद्धाश्रम के 50 बुजुर्गो के साथ हमने बिताये चंद लम्हे.....

1 फरवरी 2015
बिलासपुर में मसानगंज क्षेत्र में एक वृद्धाश्रम है जहाँ तकरीबन 35 पुरुष और 15 वृद्ध महिलाएँ अपना सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे है। जिंदगी से संतुष्ट, ना कोई इच्छा, न कोई आकांक्षा कुछ भी ख्वाइश व्यक्त करने में असमर्थ। नगर के ढेरों लोग इस आश्रम में पैसों और खाने-पीने का सामान उपलब्ध करवाने में कोई कटौती नहीं करते। हर वृद्ध खुश है, अपनी दिनचर्या में व्यस्त है। उनमें से कई तो अपना घर-परिवार होने के बावजूद यहाँ रहना ज्यादा पसंद करते है। 
डाॅ.योगेन्द्र परिहार एसईसीएल से रिटायर्ड डाॅक्टर हैं, जो इन दिनों गनियारी के जन स्वास्थ्य केन्द्र में अपनी सेवायें दे रहे हैं, उनके मार्गदर्शन में हमने कुछ लोगों से बातचीत की और हर महीने के पहले रविवार को इन बुजुर्गो के साथ कुछ समय बिताने का निर्णय लिया। हम 22 लोगों में 14 साल की मीश से लेकर युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग सब शामिल थे। हर सदस्य कलाकार था, कोई रंगकर्मी तो कोई आकाशवाणी से जुड़ा हुआ, कोई गायक और कोई लेखक, इसलिये संवेदना हर मन में थी।
1 फरवरी 2015 को पहला रविवार था। जब हम लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के बैनर से वहाँ एकत्र हुए शाम 4 बजे। उत्साह, एक चाहत, एक रोमांच सब था हम सबके मन में और यकीन मानिये जब 6 बजे हम वहाँ से निकले तो उन बुजुर्गो की आॅंखें नम थीं और हमारे मन एक ऐसी अनुभुति से लबालब, जिसकी व्याख्या शब्दों में तो बिल्कुल संभव नहीं है।
 

साकेत शुक्ला अपने कराओके के टैक्स लेकर आया था। रचिता ने माइक व म्यूजिक सिस्टम का इंतजाम कर लिया था। नाश्‍ते का भी इंतजाम कर दिया गया था। जब हमने वहां अपना-अपना परिचय दिया तो उनके चेहरे भाव विहीन थे। चेहरों को पढ़ने पर लगा जैसे वे सोच रहे हों लोग यूँ ही आते रहते हैं, भजन आदि गाकर चले जाते है, ऐसा ही ये एक और गु्रप आ गया। साकेत ने उनके जमाने का एक गीत गाया, चेहरों पर रौनक बढ़ी। चंपा भट्टाचार्य, प्राप्ति राय चैधरी, अंतरा चक्रवर्ती सबने सुर मिलाने षुरू किये। अनीष श्रीवास, अविनाष आहूजा, अरूण भांगे, अनुज श्रीवास्तव, मनीष सोनी, तृप्ति राॅय चैधरी, मंजुला जैन, कोहिनूर जेसवानी, नीरज ठाकुर, आभा शुक्ला अंशुल गुलकरी, मयूरी, शीतल सबने बुगुर्गो के बीच बीच में अपनी जगह बनाई और उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़ने की कोशि‍श शुरू कर दी। कुछ संगीतमय प्रस्तुतियों के बाद उन बुजुर्गो में से 4 लोगों ने खुद अपने ज़माने के गीत गाए। आवाज और गायिकी में दम अभी भी था, ये हमने महसूस किया।




वहाँ के निरीक्षक शर्मा जी ने कहा, ऐसा पहली बार हुआ है जब उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। अभिलाष का उस दिन जन्मदिन था। सारे बुजुर्गो ने हैप्पी बर्थ डे गीत हमारे साथ गाया और अभिलाष को उन 50 बुजुर्गो से जो आशीर्वाद मिला, उसका तो पूरे साल भर का खजाना भर गया। अभीभूत वे सब भी थे और हम सब भी। विदाई के वक्त सबको लगा पूरा महीना इंतजार करना बहुत भारी पड़ेगा। लेकिन बाकी 29 दिन हम सब 1 फरवरी की यादों मे गुजारेंगे और 1 मार्च के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में लगे रहेंगे।