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Saturday, August 4, 2012

Bolte Vichar 62 गैर ज़िम्‍मेदार लोग और आप


बोलते विचार 62

गैर ज़िम्‍मेदार लोग और आप


आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


राजेन्द्र शनिवार को घर आए थे। कहकर गए कि सोमवार को आपकी सामग्री पहुँचा दूँगा। अपना फोन नंबर भी दे गए। जब बुधवार तक उनका कोई अता-पता नहीं रहा तो उनके नंबर पर फोन किया। उधर से आवाज आई कि वे हैं नहीं, जब आएँगे तब उन्हें बता देंगे, वे आपसे बात कर लेंगे। रात को उन्हें दूसरी बार फोन किया। जवाब मिला कि वे आकर चले गए, उन्हें बताना भूल गया कि आपका फोन आया था। अगली सुबह फिर फोन किया। उधर से सूचना मिली कि वे कभी-कभी ही यहाँ आते हैं। यह फोन नंबर उनका नहीं, हमारा है।

ट्रांसपोर्ट वाले गांगुली साहब के कार्यालय में कुछ ज़रूरी बात करने के इरादे से गया। उनके असिस्टेंट ने कहा कि वे अभी तो कुछ घंटों के लिए बाहर गए हुए हैं, जैसे ही वापस आएँगे, उन्हें बता दूँगा कि आप आए थे। उसने काम पूछा। बता दिया। बोले, ठीक है, कल इसी समय आ जाइए। अगले दिन गया। असिस्टेंड ने देखकर कहा कि अरे, मैं उन्हें कल बताना भूल गया, अभी बता देता हूँ।

सुधीर बाजार में मिला। बोला, शाम को आपके यहाँ आऊँगा। कुछ खास काम था। इंतजार रहा। नहीं आया। फोन पर भी नहीं बताया कि वह नहीं आ पाएगा। अगली सुबह उसके यहाँ आया। उसने अपनी ओर से पिछली शाम न आने की कोई चर्चा नहीं की। जब पूछा तो बताया कि, हाँ मुझे जिस काम से आना था, मैं पूरा नहीं कर पाया था।

एक परिचित के यहाँ का नौकर घर से कुछ छोटा-मोटा सामान बेचने के लिए ले गया था। बाद में वह जब-जब तब-तब झुककर बोला कि आज शाम को हिसाब करने के लिए जरूर पहुँच जाऊँगा। उसके बारे में अन्यों से जिक्र करने पर पता चला कि वह उन पैंसों को शराब आदि में फूँक चुका है।

इस प्रकार की बातें आपके साथ भी रोज घटित होती होंगी। लेकिन मन छोटा न करें। गलत आदमी हर युग में रहे हैं और हर युग में रहेंगे। यदि आप दूसरों से अपनी सुव्यवस्थित चाहतों के अनुरूप अपेक्षाएँ करेंगे तो अक्सर दुःख पायेंगे। दूसरों के विश्वासघात तक को सहन करने की ताकत रखिए। आगे बढि़ए। जो खो गया उसे भुलाते चलिए। शायर के शब्दों में, जिन्दगी का साथ निभाते चलिए। लोगों के निम्न स्तरीय व्यवहार पर अपना मानसिक संतुलन न खोइए। उन पर क्रोध करके अपनी हड्डियों को कमजो़र न बनाइए। पोप ने कहा है, ‘क्रोध करना दूसरों की गलती का अपने से प्रतिशोध लेना है।’

यदि आप अच्छे हैं तो अपने चारों ओर के लोगों के दायित्वहीन व्यवहार का प्रभाव स्वयं पर वैसे ही मत पड़ने दीजिए जैसे कमल अपने चारों ओर की कीचड़ का प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ने  देता।


Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Tuesday, May 22, 2012

100 साल का सिनेमा और बिलासपुर का नज़मा रिकॉर्डिंग सेन्‍टर

बिलासपुर के नज़मा रिकॉर्डिंग सेन्‍टर में भारतीय सिनेमा के अवसर पर आयोजित प्रदर्शनी







प्रदर्शनी में भारतीय सिनेमा के दुर्लभ संग्रह के दर्शन
सिनेमा का वो दौर बुजुर्गों ने याद किया जब एक घर में रेडियो सुनने के लिये लोग जमा हुआ करते थे.....

स्‍पूल टेपरिकॉर्डर का ज़माना...आनंद फिल्‍म का वो बाबू मोशाय....रिकॉर्ड करने वाला यंत्र जो कई आकाशवाणी केन्‍द्रों में आज भी मौजूद है..


 
ग्रामोफोन रिेकॉर्ड.....जिसे आज लोग ड्राइंगरूम में रखना शान समझते हैं....एक समय था जब ये घरों में शान के साथ बजा भी करते थे....रिकॉर्डस अभी भी मिल जाते हैं, परन्‍तु इस बेजोड़ यंत्र के पार्ट्स मिलने अब बंद हो चुके हैं







  उस दौर मे सिनमाघरों में 20-25 पैसों में फिल्‍मों के गीतों की किताबें मिला करती थीं...


नज़मा रिकॉर्डिंग सेंटर बिलासपुर की 1932 की दुकान है यानि 1931 से एक साल बाद जबकि भारत में पहली बोलती फिल्‍म बनी थी....यहां आज के अशफाक भारमल के दादाजी ने यह संग्रह आरंभ किया था...इस अनमोल संग्रह को आज उनकी चौथी पीढी भी जतन से सहेज कर रख रही है और भारतीय सिनेमा के 100वें वर्ष के अवसर पर इस संग्रह को लोगों के सामने प्रदर्शित भी कर रही है....खास बात ये कि ये सारे उपकरण आज भी चलती अवस्‍था में हैं.....इस अनमोल धरोहर को संग्रहित करके रखने के लिये पूरा भारमल परिवार बधाई का हकदार है...



Production - Libra Media Group, Bilaspur (C.G.)

Sunday, November 20, 2011

बोलते शब्‍द 67



बोलते शब्‍द 67
आज के शब्‍द जोड़े हैं 'प्रेक्षक'  व 'दर्शक'
और  'फूलना' व 'फलना' 
                         आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर  - संज्ञा टंडन

133. 'प्रेक्षक'  व 'दर्शक' 






134. 'फूलना' व 'फलना' 




Production - Libra Media Group, Bilaspur (C.G.) India

Friday, October 14, 2011

बोलते शब्‍द 57



बोलते शब्‍द 57
आज के शब्‍द जोड़े हैं 'चोर पकड़ाया' व 'बच्‍चा फेंकाया'
और  'चोली' व 'दामन' 
 
                         आलेख - डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा                          
स्‍वर      - संज्ञा टंडन


113. 'चोर पकड़ाया' व 'बच्‍चा फेंकाया' और  'चोली' व 'दामन' 

 
                   
114. 'चोली' व 'दामन' 





Production - Libra Media Group, Bilaspur (C.G.) India

Tuesday, March 22, 2011

काव्‍यभारती और 2000 गीतों के प्रणेता मनीष दत्‍त

 
काव्यभारती एक कला संस्थान जहां से सीखे बच्चे अपने आप में एक संस्थान बन कर पूरी तरह परिपक्व होकर निकले हैं। आपको ये जानकर आश्‍चर्य होगा कि‍ .......
1983 में निराला, मुकुटधर पांडेय आदि कवियों की रचनाओं पर सुपर 8 मिमी चलचित्र का निर्माण काव्य भारती ने किया।
1987 1987 में काव्य भारती का ‘अमर बेला‘ ग्रामोफोन रिकार्ड तैयार हुआ। यह रिकार्ड आज भी आकाशवाणी के सभी केन्द्रों से प्रसारित किया जाता है।
अब तक लगभग हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के 2000 गीत स्वरबद्ध किये हैं।

1960 में नाट्य भारती नाम से इस संस्था की स्थापना हुई थी जिसमें नाटक के साथ साहित्यिक गीतों के कार्यक्रम शुरू किये गए, धीरे-धीरे देखने, सुनने वालों की संख्या भी बढ़ती गई। इस बीच उन्होंने महाप्राण निराला के अपरा, नये पत्ते, अणिमा, बेला आदि पर नृत्य संगीत रूपक प्रस्तुत किये गए, निरंतर हिन्दी के साहित्यिक गीतों को स्वरबद्ध और नृत्यबद्ध कर प्रस्तुत किये गए। यहां के कलाकारों ने प्रसाद, पंत, जायसी, महादेवी, निराला, नीरज, बच्चन आदि की अनेक रचनाओं को प्रस्तुत किया। गायन, नृत्य, नृत्य नाट्य, काव्य पाठ तथा काव्य चित्रण आदि अलग-अलग विधाओं पर अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिताएं काव्य भारती द्वारा प्रतिवर्ष की जाने लगी और इनमें लगभग 1500 प्रतियोगी विभिन्न स्थानों से आकर भाग लेने लगे। महादेवी वर्माजी के निर्देश और इच्छानुसार 3 जनवरी 1978 को ‘काव्य भारती कला संगीत मंडल‘ की विधिवत स्थापना की। काव्य भारती संस्थागत रूप में आगे बढ़ती रही तथा 1979 में खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से संबद्ध होकर शास्त्रीय संगीत नृत्य का विद्यालय- कला संगीत वीथिका की स्थापना की और छात्र-छात्राओं को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देकर गायन-वादन और नृत्य की परीक्षा में उन्हें सम्मिलित कराने लगे। इससे एक फायदा काव्य भारती को हुआ, शास्त्रीय संगीत की परीक्षा में भाग लेने वाले इन्हीं छात्रों के सहयोग से काव्य भारती निरंतर कवियों की रचनाओं पर नये-नये कार्यक्रम देने लगी, इसमें कालीदास से लेकर वर्तमान तक के कवियों का कालजयी काव्य शामिल था।

काव्‍यभारती संस्‍था के संस्‍थापक मनीष दत्‍त, जि‍न्‍होंने सैकडों बच्‍चों को कलाकार बनाया, हजारों कलाप्रेमि‍यों को राह दि‍खाई, पूरा जीवन कला को सर्मि‍पत करने वाले गुरू मनीष दत्‍त जी आज 70 वर्ष के होकर भी सक्रि‍यता के साथ कलासाधना में जुटे हैं, अनके बारे में एक जानकारी.....  ‍
एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में 10 मई 1940 को मनीष दत्त का जन्म छत्तीसगढ़ (भारत)  के बिलासपुर जैसे छोटे से शहर में हुआ। पिता स्व. सलिल कुमार दत्त लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर थे। वे भी पिता की तरह इंजीनियर बनना चाहते थे।किन्तु 12 वर्ष की उम्र में जयदेव नाटक में मंचावतरण के बाद उनकी रूचियां बदल गई और वे नाटकों के दीवाने हो गये। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण पढ़ाई में तो कोई व्यवधान नहीं पड़ा किन्तु उन्होंने कला और नाटकों के दीवानगी में अपने भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं सोचा। यहां तक कि अपने परिवारिक दायित्वों से विमुख ही रहे। कला संगीत और नाटकों में रूचि लेने वाले बालक मनीष दत्त जिनका वास्तविक नाम सुनील दत्त है, ने 16 वर्ष की अल्पायु में संकल्प लिया कि वे हिन्दी साहित्यिक गीतों को सरल और गेय बनाकर हिन्दी समाज में प्रचारित करेंगे। बंगाली परिवार में जन्म लेने के कारण उनके सामने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का उदाहरण था। बांग्ला भाषी लोग रवीन्द्रनाथ, काजी नजरूल इस्लाम, डी.एल. राय आदि कवियों की रचनाओं को बड़े गर्व के साथ गाते थे जबकि हिन्दी कवियों की रचनाएं पोथियों और कक्षा की चारदीवारी तक ही सीमित थी। यह विरोधाभास बालक मनीष को सालता था इसीलिये उन्होंने संकल्पित होकर अपनी कल्पना को मूर्त रूप देना शुरू किया।

हिन्दी भाषी समाज के लिये काव्य भारती और मनीष दत्त द्वारा किया गया यह कार्य मौलिक तथा मूल्यवान है। लेकि‍न विगत 56 वर्षों में मनीष दत्त द्वारा किये गये कार्य आज देख-भाल के अभाव में नष्ट होने के कगार पर है। इनके गीतों, नृत्यों नाटकों तथा नृत्य नाटिकाओं में हमारे देश की उच्चतम और भव्य संस्कृति का निरूपण है। अतएव यह आवश्यक है कि हम अपनी आज की इस उपलब्धि को कल की पीढ़ी के लिए सहेज कर और संरक्षित करके रखे ताकि समय आने वाली भावी पीढ़ी तथा दूर-दूर में फैले हुए रूचि सम्पन्न लोग इसका उपयोग कर सकें।
तात्कालिक आवश्यकता
1. 2000 गीतों को पुनः गीत और नृत्य के रूप में व्यवस्थित और स्तरीय रिकार्डिंग करना। ताकि ऐसे लोगों तक, जिन्हें इसकी आवश्यकता है, इसे पहुंचाया जा सके तथा इनका संग्रह भी तैयार हो सके।

2. मनीष दत्त की उम्र हो चुकी है और वे ही अकेले व्यक्ति है जिनका यह संपूर्ण सृजन है, अतएव यह आवश्यक है कि उनके जीवन काल में ही उन्हीं के निर्देशन में सारे गीतों, नृत्यों और नाटिकाओं की पुनः प्रस्तुति की जाए, ताकि इसके स्वरूप और मंतव्य में किसी प्रकार का कमी न हो या विकृति न हो।

इसीलिए हम-आप तक पहुंचे है  कि आप स्वविवेक से अपना यथासाध्य सहयोग इस पुनीत कार्य में स्वयं हाथ बंटाने तथा लोगों को प्रेरित करने आगे आवें। यह हिन्द और हिन्दी के लिए अत्यंत आवश्यक है। बूंद-बूंद से सागर भरता है। आपका छोटा आर्थिक अनुदान या सहयोग चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो संस्कृति का महासागर बनकर लहरायेगा इसे आप सच माने।  
                                                                                                                             काव्‍यभारती वेबसाइट से साभार
काव्‍यभारती की वेबसाइट का लिंक  http://kavyabharti.org/activities.html


और अब काव्‍यभारती पर आधारि‍त आकाशवाणी बि‍लासपुर में नि‍र्मि‍त व म;प्र; व छ;ग; के सभी केन्‍द्रों से प्रसारि‍त समि‍न्‍वत रूवक  'भारत में है वि‍श्‍वास'  की ऑफलाइन रि‍कार्डिग का पॉडकास्‍ट आपके लि‍ये.....प्रस्‍तुति‍, आलेख व वाचक स्‍वर सुप्रि‍या भारतीयन का है 


Wednesday, December 15, 2010

ek purani post

गुज़रा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा.........



Ashok bajaj ke saathRadio celone ke announcers
50-60 के दषक में श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेषन का बोलबाला घर घर में था। सीलोन से बजने वाले कार्यक्रम बिनाका गीतमाला, मराठा दरबार की महकती बातें और भी ढेर सारे कार्यक्रम लोगों को ज़बानी याद थे और इन कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने वाले उद्घोषकों की आवाज़ें आज भी लोगों के ज़ेहन में मौजूद हैं। अमीन सयानी, मनोहर महाजन, विजयलक्ष्मी, रिपूसूदन ऐलावादी, कुमार आदि के नामों से रेडियो के पुराने श्रोता आज भी जुड़े हुए हैं। बल्कि इन आवाज़ों से फोन पर सीधे बातचीत करके सुनते भी रहते हैं। लेकिन इनमें से कई आवाज़ जब एक साथ मंच पर आज की तारीख में जमा हो जाएँ तो यही कहा जाएगा न कि गुज़रा हुआ ज़माना लौट आया है दुबारा।
Ripusudan Alawadi
20 अगस्त 2010, रायपुर के चैम्बर ऑफ कॉमर्स का हॉल और मंच पर अंबिकापुर, रायपुर, बिलासपुर के आकाशवाणी केन्द्रों के उद्घोषकों के साथ मौजूद थे मनहर महालन, रिपुसूदन ऐलावादी वॉयस ऑफ अमेरिका की विजयलक्ष्मी डी सेरम और हिन्दी फिल्मी गीतों के गीतकोष क लेखक हरमिन्दर सिंह ‘हमराज़’। श्रोता दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में चाईबासा बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली, इंदौर, कटनी व छत्तीसगढ़ के हर क्षेत्र से तकरीबन 350 श्रोताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई। अषोक बजाज के नेतृत्व में इस आयोजन में छ.ग. के संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी अपने विचार रखे और कहा कि रेडियो का आज भी अलग महत्व है। श्रोता सबसे बड़ा सरौता होता है यानि सबसे बड़ा समीक्षक श्रोता ही है। आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण बात थी 1200 घंटे अपनी आवाज डिस्कवरी चैनल को देने वाले, फैषन षो में हिन्दी को स्थान दिलाने व बरकरार रखने वाले, अपनी जिंदगी के अनेक वर्ष सीलोन से देष भर में अपनी वाक्कला का जादू बिखेरने वाले मनोहर महाजन ने देष के हर हिस्से को छोड़कर रायपुर को चुना अपनी किताब ‘यादें सीलोन की’ के विमोचन के लिये। षायद इससे भी बड़ी बात थी 14 वर्ष सीलोन और 24 साल वॉयस ऑफ अमेरिका में अपनी मधुर आवाज की तरंगें फैलाने वाली विजयलक्ष्मी जी वाषिंगटन से यहाँ इस कार्यक्रम के लिये, अपने पुराने श्रोताओं से मिलने के लिये आईं। इन दोनों से कम समय सीलोन में व्यतीत करने वाले रिपुसूदन ऐलावादी जो कुमार के नाम से लोकप्रिय रहे हैं भी आज तक मुबई में आवाज के जरिये ही अपना नाम कमा रहे हैं, 4 वर्षों के कोलबो के सफर की यादें अब भी ताजा हैं उनके जेहन में जिसे श्रोताओं के साथ बाँटने में उन्होंने कोई कंजूसी नहीं की।
Manohar Mahajan ki book 'yaden celone ki' ka vimochan
रेडियो सीलोन का दो घंटों के लिये पुनः प्रसारण शुरू होना एक उपलब्धि है, लेकिन इस प्रसारण समय में वृद्धि कराना एक चुनौती बन चुका है। रेडियो सीलोन के प्रषंसकों का जमावाड़ा, पुराने उद्घोषकों के प्रति लगाव व श्रद्धा का जज़्बा और गुज़रे ज़माने को वापस लौटाने का श्रोताओं का जुनून सफलता पाकर रहेगा।

Tuesday, December 14, 2010

एक उद्घोषक की नज़र से श्रोता सम्मेलन

विगत 12 दिसंबर को 981 किलोहर्ट्ज़ पर आकाशवाणी का रायपुर केन्द्र और 103.2 मेगाहर्टज़ पर आकाशवाणी का बिलासपुर केन्द्र एकत्र हुआ दोनों शहरों के मध्य स्थित सिमगा में। अवसर था छ.ग.रेडियो श्रोता संघ का सम्मेलन। तकरीबन 250 श्रोताओं का जमावाड़ा था यहाँ पर जो म.प्र. व छ.ग के विभिन्न क्षेत्रों से यहाँ उपस्थित हुआ था। रायपुर, बिलासपुर भाटापारा, बिल्हा, तिल्दा, दुर्ग, कवर्धा बलौदाबाजार, सरगांव के अलावा रतलाम, कटनी, रीवा, शहडोल, कोरबा, अंबिकापुर, भटगाँव जैसे स्थानों के श्रोताओं का प्रतिनिधित्व रहा इस सम्मेलन में।



मीडिया का कोई भी क्षेत्र हो जब तक लेखक या प्रस्तुतकर्ता को पाठक, श्रोता या दर्शक उपलब्ध न हों तब तक मीडिया का वह क्षेत्र पूर्ण नहीं माना जा सकता। प्रशंसकों और आलाचकों के बगैर प्रस्तुति अधूरी रह जाती है। रेडियो....एक पुराना माध्यम जिससे श्रोता बरसों से लगातार जुड़े रहे हैं। आज के युग में ये माना जाता है कि अब ये माध्यम पिछड़ने सा लगा है, लेकिन श्रोताओं का जोश, उत्साह और अपने प्रस्तोताओं के प्रति समर्पण का भाव यूं तो केन्द्रों में आने वाले पत्रों के माध्यम से दीखता है, फोन काल्स पर उनके भाव अभिव्यक्त होते हैं लेकिन श्रोता सम्मेलन में उनसे रूबरू मिलना, उनके भावों को पढ़ना, उन्हें समझ पाना हम ब्राडकास्टर्स के लिये भी एक ऐसी अनुभूति होता है जिसको बयां कर पाना असंभव सा है।
 
रायपुर के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष श्री अशोक बजाज के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ ये श्रोता सम्मेलन। जो खुद एक वरिष्ठ रेडियो श्रोता व प्रशंसक भी हैं। वरिष्ठ श्रोताओं में बचकामल, धरमदास वाधवानी, उद्धव श्याम केसरी, डा,प्रदीप जैन, आर.एस.कामड़े, संतोष देवांगन, परसराम साहू, ईश्वर चंद साहू आदि के आपसी सामंजस्य ने विभिन्न श्रोता संघों को जोड़कर इस तरह के आयोजन करवाने पुनः आरंभ किये है। जिसमें झावेन्द्र धु्रव, संतोष वैष्णव, नसीब मोहम्मद, हीरामणि वर्मा और अनेक युवा श्रोता अपनी पूरी शक्ति और ऊर्जा के साथ जुड़े हुए हैं। इस अवसर पर वरिष्ठ श्रोताओं और उद्घोषकों का सम्मान हुआ, डीएक्स-अंजलि नामक एक पत्रिका का विमोचन किया गया जिसमें रेडियो की विभिन्न जानकारियों के साथ ही देश भर के रेडियो केन्द्रों से जुड़े लोगों के साक्षात्कार, कार्यक्रम व श्रोताओं की जानकारियां भी शामिल हैं। श्रोताओं का रेडियो से जुड़ाव व लगाव, जोश और जुनून इसमें साफ नज़र आता है। सरगुजा क्षेत्र के 17 युवा श्रोता साथियों की उपस्थिति ये अहसास करा गई कि रेडियो आज भी जन जन में बसा हुआ है।

सिमगा में आयोजित इस रेडियो सम्मेलन में आकाशवाणी रायपुर के कार्यक्रम अधिशासी डा,समीर शुक्ला, उद्घोषक दीपक हटवार, श्याम वर्मा और अनिल सालोमन एवं बिलासपुर आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक हरीशचंद्र वाद्यकार के साथ आकस्मिक उद्घोषक सुनील चिपड़े व संज्ञा टंडन का सम्मान किया गया।
           एक उदघोषक की हैसियत से हम तो यही कहेंगे कि हमारे श्रोता हैं तो हम हैं।

Thursday, October 7, 2010

पॉडकास्टिंग: आवाज का आप तक पहुँचने का ज़रिया

इंटरनेट के आने के बाद से हर चीज आसान हाने लगी है। कुछ वर्ष पहले तक लोग इससे केवल सतही तौर पर जुड़ रहे थे। जरूरत पड़ने पर कंप्यूटर खोलकर अपने काम की चीज देखी और नेट बंद, ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल शुरूवात में ऐश्वर्य का साधन बना फिर दिखावे का साधन और अब एक आवश्यकता जिसके बगैर एक दिन भी नहीं कटता।
हम बात कर रहे थे इंटरनेट की। अब लोग इसको ज्यादा समय देने लगे हैं। अपने फज्ञेटोग्राफ्स, लोगों की बातचीत, दुनिया भर की जानकारी के साथ ही अपनी भवनाओं को बाँटने का साधन भी बन चुका है ये इंटरनेट। ब्लॉग लिखना अपनी भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाने का एक माध्यम है। अपने वीडियोज़ को दुनिया के दूसरे कोने तक पहुँचाने के लिये यू-ट्यूब जैसे साधन हैं और अपनी आवाज़ के माध्यम से शिक्षा, गीत, कहानी, मन की बातें दूसरों तक पहुँचाने का जरिया तेजी के साथ बढ़ रहा है पॉडकास्टिंग। तो मेरे इस ब्लॉग में शामिल रहा करेगा पॉडकास्ट भी। कुछ दुर्लभ आवाजें भी हम आप तक पहुँचाएँगे इस माध्यम से और कुछ आवाजें होंगी हमारे आपके बीच की आवाजें। कुछ ऑडियो कार्यक्रम जिनका निर्माण हमने किया है वे भी स्क्रिप्ट सहित आपकी स्क्रीन पर होंगे। पहले आवाज़ की दुनिया के सम्मोहन पर कुछ बातें मेरे मन की सुनिये......

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आज पहली बार पॉडकास्टिंग के साथ अपने इस ब्लॉग पर प्रयोग करते हुए आपको रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं हमारे प्रेरणास्रोत डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा की एक बहुत पुरानी, दुबली-पतली लेकिन मजबूत कविता ‘लवशाला’ की स्क्रिप्ट और उनकी आज की 76 वर्षीय आवाज में एक बानगी प्रस्तुत कर रहे हैं।

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दो शब्द... लेखक के
आपने शालाएँ तो बहुत देखी होंगी, पर 'लवशाला' पहली बार देखिए। इसे मैंने तब लिखा था, जब मुझे लोग 'दादा जी' नहीं कहा करते थे। वे भी क्या दिन थे! अब तो रातें ही रातें हैं! और वह भी जगराते वाली।
पाठकों से आग्रह है कि वे इस 'दांपत्य-मंजूषा' को 'हनुमान चालीसा' के समान पढ़ा करें। उनके सारे संकट दूर हो जाएँगे।

लवशाला
कविता के ऑंचल से लेकर
आसव मृदु वाणी वाला।
भीने भावों के फूलों से
गूँथ रहा हूँ यह माला।
प्यार हृदय का जीवन-धन है,
इसका रंग दिखाने को,
यौवन की फुलवारी-जैसी
खोल रहा हूँ लवशाला।

मद में भीगी रसभरियों से
भरा हुआ है यह प्याला।
गंगा-सी बहती है इसमें
मीठे सपनों की हाला।
दो छोरों का जुड़ना इसमें,
गठबंधन दो कृतियों का,
हर लड़की है राधा इसमें,
हर लड़का मुरलीवाला।

इस मंदिर में प्रिय-प्रियतम के
इठला रही प्रणय-वाला।
अर्पण है हृदयों का इसमें
और दर्द भोला-भाला।
उलटी-सीधी साँसें हैं कुछ,
प्यार-भरी कुछ बातें हैं,
और प्रेमियों के मन का,
इसमें कुछ है हालाचाला।

पुरखों ने भी प्यार किया था
छिप-छिप कर ढीला-ढाला।
पोते-परपोते भी आगे
प्यार करेंगे मतवाला।
हर पीढ़ी में बिकते आए,
मोल बिला ही दिलवाले,
इसमें हैं लखपति वे, जिनके
दिल का निकला दीवाला।

मन के सारे दर्द भुलाना
खूब सिखाती है हाला।
और निराशाओं से पीछा
खूब छुड़ाता है प्याला।
लेकिन सारे दर्द और
सब खोते हुए निराशाएँ,
जीवन भर का साथ निभाना
सिर्फ सिखाती लवशाला।

नर हो, सुर हो या दानव हो,
गोरा हो अथवा काला।
संसारी हो या हो वैरागी,
बहनोई अथवा हो साला।
प्यार सभी के मन का मोती,
धन निर्धन-धनवानों का,
उसके बिना अधूरे सब हैं,
लल्ला, लैला या लाला।

हीरे, मोती, पन्ने, नीलम,
या धन-वैभव की माला।
लेन-देन इनका प्रेमी के
लिए व्यर्थ का घोटाला।
झूठी है हर वस्तु यहाँ की,
अटल सत्य बस एक यही-
चाहे जल-थल-नभ मिट जाएँ,
पर न मिटेगी लवशाला।

प्रेमी एक समाज-सुधारक,
सचमुच कुछ करने वाला।
ऊँच-नीच का, जाति-पाँति का
उसने भेद मिटा डाला।
प्रेम किसी से भी हो, सब ही
उसके लिए बराबर हैं,
नलवाली हो या फलवाली,
या महलोंवाली बाला।

यही निबटना है हम सबको,
हाथ मसलना, यदि टाला।
इस जीवन के बाद वहाँ क्या?
केवल है गड़बड़झाला।
जो कुछ भी मिलना है हमको,
यहीं मिलेगा, यह तय है,
फिर न मिलेंगे ऐसे अवसर,
फिर न मिलेगी लवशाला।

पहले रह कर दूर-दूर ही
दिखता अति भोला-भाला।
फिर धीरे से पास पहुँच कर
करता गड़बड़-घोटाला।
लवशाला के नायक का यह
'प्रोग्राम' निश्चित रहता,
आखिर में वह जीत जाता
तब बन जाता है घरवाला।

स्वर्ग, सुनो क्या है मतवालो?
'प्रिय की बाँहों की माला'।
अपने गले लिपटने पर जो
देती सुख सुरपुर वाला।
आलिंगन की गंध नरक के
द्वार बंद कर के रखती,
सब पापों की एक दवा है-
पापहारिणी लवशाला।

प्यार हृदय की भूख-प्यास है,
अमर सुधा का यह प्याला।
प्रेमी अपनी प्यास बुझाता
पी कर नयनों की हाला।
उसकी शब्दावली जरा-सी,
आठ शब्द जिसमें केवल,
'प्रेम, प्रेमिका, मैं, मेरी वह,
मैं उसका होने वाला' ।

लवशाला के दर्शन करके
झूम उठा हर मतवाला।
दो जवान, दोनों दिलवाले
चंचल युवक, मधुर बाला।
एक इधर से, एक उधर से,
आकर दोनों एक हुए,
खोकर सत्ता हृदयों की
फूल रही है लवशाला।

जप-तप, पूजा-पाठ, साधना,
भस्म, मूर्ति, घंटा, माला।
व्यर्थ तीर्थ, धन, यश, पद,
गरिमा, वैभव, मदिरा का प्याला।
स्वाति-बूँद बस बूँद और
सब बूँदें हैं पानी खाली,
अपनी बाला ही बाला बस
बाकी हर बाला ख़ाला।

दो चीजें हैं जिनमें खुद ही
आकर्षण होने वाला।
दोनों चुंबक, दोनों लोहा,
क्यों न मचे हालाचाला।
प्यार अवश्यंभावी जग में,
क्योंकि जवानी आती है,
चूँकि जवानी आती है,
फिर क्यों न जवाँ हो लवशाला।

प्यार न हो, तो विश्व-प्रगति की
फिर न गुँथे आगे माला।
कलियाँ और फूल फिर जग में
जन्म न लें चाहों-वाला।
संतति है वरदान प्यार का,
प्रेम-बेल का वह फल है,
प्यार न हो, तो वंश-वृध्दि पर
रोक लगा दे लवशाला।

प्रियतम यदि अपने हाथों से
पहना दे डोरा काला।
उसकी कींमत के आगे फिर
क्या है हीरों की माला।
प्रिय की है हर चीज अनोखी,
उसका प्यार शराबी है,
उसकी बातों में होता है,
काला जादू मतवाला।

मंदिर-मस्जिद सब भूलोगे,
आकर देखो लवशाला।
साँसों में दिन-रात जपोगे
प्रिय के यादों की माला।
अरमानों के फूल चुनोगे
पूजा करने को प्रिय की,
और कहोगे- ''अहा, अहाहा!
मैंने सब कुछ खो डाला''।

प्यार बिछा है भू-तल पर यों-
जल है युवक, भूमि बाला।
इन दोनों का मिलना-जुलना
जीवन भर चलनेवाला।
हम भी अपनी घड़ियों में कुछ
मिल-जुल लें, कुछ कर-धर लें,
दिन थोड़े हैं, प्रेम बड़ा है,
शरण-भूमि है बस लवशाला।

काम बिना ही रातों में भी
जो न कभी सोने-वाला।
भूख-प्यास को जिसने अपनी
मतलब बिना उड़ा डाला।
निश्चय ही समझो उसको है
'प्रेम' नामका सुंदर वर,
बहुत खुशी से उस ओर बढ़ाता,
जिसने यह बुखार पाला।

प्यार घाव पर मरहम जैसा,
चैन मधुर देने वाला।
भरा हुआ सुख ही सुख जिसमें
ऐसा वह अजीब छाला।
तकलीफों को छील-छील कर
मीठा दर्द बना देता,
बेचैनों के लिए दवा-सी
खुली हुई है लवशाला।

पहले किसी कली पर जिसने
बुना इशारों का जाला।
फिर सारा का सारा मानस
अपना उसको दे डाला।
निष्ठा के अप्रतिम सिंचन से
खिल जाती वह गंधमयी,
बन जाती उसके ऑंगन की
पुष्पवाटिका वह बाला।

घोंचू, मूर्ख, गँवार, गधा हो
या बिलकुल भोला-भाला।
बुद्धू, नीच, अनाड़ी हो या
हो तन या मन का काला।
कलुषित लोहे-सा भी हो यदि,
उसका स्वर्ण बनाने को,
बन जाता पारस का पत्थर
प्यार निराला मतवाला।

नशा प्यार का सबसे गहरा
गिन कर सौ बोतल-वाला।
चढ़ कर फिर यह तभी उतरता,
जब मिलती मन की बाला।
प्रेमी तब हो जाता मोहन,
राधामोहन, मनमोहन,
और प्रेमिका स्वागत करती,
लेकर ओठों का प्याला।

तरुण फूल, तरुणी कलिका को
गूँथ मिला दे, वह 'माला'।
दो प्राणों को एक साथ जो
एक नशा दे, वह 'हाला'।
एक दूसरे के हृदयों में,
कस कर चुभने वालों को,
'प्यार' नाम की डोरी से जो
कस बाँधे, वह 'लवशाला'।

गंगा की पावन धारा हो
या कोई गंदा नाला।
भाव एक सब में मिलने का
बह खुद को खोने वाला।
चाह सभी में अपने प्रिय में
निज अस्तित्व गँवाने की,
सबका है बस लक्ष्य एक ही-
वैतरणी सी लवशाला।

''नकली प्रेमी कौन ?''
उठाती प्रश्न सलोनी लवशाला।
उत्तर मिलता 'जिसने खुद को
जीते जी मृत कर डाला'।
'असली प्रेमी कौन ?' कि जो
खुद मरने पर भी जीता हो,
'प्यार प्रथम, भगवान बाद में'
इसका जप करने-वाला।

चाहे असफलता की बरछी
हो, चाहे दुख का भाला।
वह समाज की घुड़की से भी
है न कभी डरने-वाला।
साहस की हड्डियाँ, धैर्य का
मांस उसे निर्मित करते,
प्रेमी को भगवती शुभा ने
काफी फुरसत में ढाला।

रजनी की अलकों को छूकर
छलकाया मन का प्याला।
तारों के झिलमिल सिंगार ने
यौवन-धन बिखरा डाला।
ऑंखें आगे बढ़ी चूमने
सरस साँवली आभा को,
वे सारे चुँबन बटोरने
चली लजीली लवशाला।

दीवाली है आज, खिले हैं
दीप, सजी है लवशाला।
धूम मचाती है नस-नस में
प्रियतम की छवि की हाला।
नजरों पर नजरें जब होंगी,
वक्त ठहर कर बोलेगा-
प्रेमी की ऑंखों का प्याला
है न कभी भरने-वाला।

सींच-सींच कर भाव-नीर से
प्रेमोद्यान अगर पाला।
चाह-भरे अरमानों का यदि
फिर उस पर पहरा डाला।
खूब खिलेंगे फूल मिलन के
और तृप्ति के फल मीठे,
ब्रह्मानंद ग्रहण कर लेंगे
सजन तरुण, सजनी बाला।

खाना, हँसना, मौज उड़ाना
यह सिद्धांत बना डाला।
आज हुआ जो, बीत गया वह,
फिर न कभी आने-वाला।
चार दिनों के बाद यहाँ से
अपना टिकट कटाना है,
इस कारण अपने प्रियतम की
जल्दी जपनी है माला।

प्रेमी जपता रहे निरंतर
प्रिय के नामों की माला।
जीवन की अंतिम घड़ियों तक
वह न कभी थकने वाला।
बात न हो यदि प्रिय से, तो भी
उसकी आशा धैर्य रखे,
अमर प्रतीक्षा का वह पुतला,
उसे न छोड़े लवशाला।

खोया देख उषा की लाली,
बना उसीका मतवाला।
चाहा गले लगा लूँ अपने
बना उसे अविचल माला।
बिखरा रूप दिशाओं भर का
सिमट समाए इस मन में,
और बहारों से बजवा दे
शहनाई यह लवशाला।

पहले मैंने 'प्यार' नाम के
साँचे में खुद को ढाला।
फिर अपना हर क्षण अपने उन
मनभावन पर खो डाला।
उसके बाद चढ़ाया उन पर
जब अपना अपनापन भी
फौरन अपना लिया उन्होंने
मुझको पाकर दिलवाला।

प्रेमी वह, जो अपनी उनसे
प्यार बहुत करनेवाला।
और प्रेमिका वह, जिसने मन
अपना उनको दे डाला।
प्यार एक चुभता काँटा है,
फूलों-सा वह कोमल है,
और किसी के दिल के टाँके
सी दे जो, वह 'लवशाला'

खेल-खेल में भी रूठा हो
यदि मन में बसनेवाला।
तो सारा दिन लगता अंधा,
सूरज भी लगता काला।
प्यार बड़ा ही जादूगर है,
उसके एक इशारे पर,
जल-थल अंगारे-सा लगता,
चाहे हो ठंडा पाला।

उन बालों का, उन गालों का,
उन ऑंखों का मतवाला।
ध्यान करे जब उन बातों का
भर कर ऑंखों का प्याला।
अपनेपन को भूल-भाल जब
वह प्रियतम में खो जाए,
तब उसको बाँहों में लेकर
शाबाशी दे लवशाला।

प्यार नाम की मदिरा से हो
भरा हुआ मन का प्याला।
और गुलाबी नशा चढ़ा हो,
धुत हो अति पीने-वाला।
फिर उसको कुछ काम न जग से,
योगी सब उसके नीचे,
एक उसे वैराग कि पा लूँ
अपनी जोगन मधुबाला।

चाहे ऑंखों के आगे हो
शुष्क निराशा का भाला।
या गरदन में हो असफलता
के कटु घावों की माला।
गहन विरह की ऑंधी हो या
हो तूफान अड़चनों का,
पर प्रेमी इन पतझड़ियों में
धैर्य न है खोने-वाला।

संसारी को ऐश चाहिए,
वैरागी को जप-माला।
साधु-संत को भ्रम का धंधा,
बनिए को धन का नाला।
पर प्रेमी की चाह और कुछ,
उसकी प्यास निगाहों की,
उसको बस चाहिए प्रेमिका
की मुस्कानों का प्याला।

प्यार न जिसने किया कभी,
वह मन की परतों से काला।
पर प्रेमी का हृदय प्यार ने
निर्मल जल-सा कर डाला।
पापी, नीच, कुकर्मी भी यदि
प्यार करे दिलवाली से,
उसके पुरखों तक का जीवन
बन जाए सद्गति-वाला।

सब विद्याओं से बढ़ कर है
ठाई अक्षर की माला।
पंडित, ज्ञानी, प्रेम-धुरंधर
बन जाता जपने-वाला।
गहराई सागर की उथली
प्रेमी के गहरे दिल से,
उसकी नैया पार कि जिसका
पूजाघर हो लवशाला।

हृदय-रूप पिंजरे में जिसने
प्रेम-रूप तोता पाला।
प्रेम-वारि को जिसने अपने
मन की प्यास बना डाला।
धर्म, अर्थ, मोक्ष से बढ़ कर
पाया सब-कुछ उस नर ने,
प्रेम-महल में घुस कर जिसने
अंदर से डाला ताला।

प्रेमी की बातों का जिसने
स्वाद चखा हो मतवाला।
उसको शक्कर फीकी लगती,
लगता कड़वा हर प्याला।
सारे रिश्ते खट्टे लगते
हलुआ लगता मिर्चो-सा,
सब-कुछ ऐसा-वैसा लगता,
विषमय लगती मधुशाला।

देख घटा श्यामल मेघों की
मचली भावों की हाला।
सावन का मैं मोर बन गया,
मन ने मुझे नचा डाला।
नर-मादा चिड़ियों की नजरें
उड़ने लगी तले ऊपर,
चहक-चहक कर जो कहती हैं-
'लवशाला-चूँ-लवशाला'।

संध्या के सारे रंगों की
पहन निर्वसन वरमाला।
परियों का मेहमान बना मैं
खुद को इंद्र बना डाला।
घूमा नभ के हर कोने में,
दिखा मुझे हर और यही-
तारक-दल नर, किरणें नारी,
और प्रकृति है लवशाला।

वह घर है वीरान कि जिसमें
प्रियतम ने न कदम डाला।
वह घर है श्मशान कि जिसमें
बहे न प्राणों की हाला।
वह घर नरक समान कि जिसमें
प्रेमी जन्म न लेते हों,
वह घर स्वर्ग समान कि जिसमें
हर प्राणी हो दिलवाला।

मैंने सोचा, मैं प्रोफेसर,
विद्या को घर में पाला।
सब कहते मैं ज्ञानी-ध्यानी,
ऊँची तर्क-बुद्धि-वाला।
लेकिन एक अपढ़-सी लड़की
बोली- 'बिलकुल अनपढ़ हो,
सीखो पहला पाठ यहाँ तुम',
और दिखा दी लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ डॉक्टर,
हर इलाज करने-वाला।
बीमारी को मैंने घर से
कोसों दूर भगा डाला।
लेकिन एक नशीली लाा
दिखते ही बीमार पड़ा,
वही सिर्फ डॉक्टर मेरी,
अस्पताल है लवशाला।

मैंने सोचा, मैं वकील हूँ,
खूब बहस करने-वाला।
मैंने बहुत जजों को अपने
तर्को से बहका डाला।
लेकिन एक चपल बाला की
बातों से मैं हार गया,
उसने समझाया- 'सबसे है
बड़ी कचहरी लवशाला'।

मैंने सोचा, मैं हूँ साहब,
बहुत-बहुत इात-वाला।
सब झुकते हैं मेरे आगे,
पैसा, बाबू या लाला।
लेकिन एक सुभग रमणी ने
घुटने मेरे टिका दिए,
अपनी इात से भी प्यारी
लगती मुझको वह बाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ नेता,
चक्कर में पड़ने वाला।
जनहित का षडयंत्र चलाकर
जग भर को चकरा डाला।
लेकिन एक बड़ा चक्कर
जब से ऑंखों में समा गया,
तब से चारों ओर दीखती
लवशाला ही लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ राजा,
सब पर रौब जमा डाला।
दास-दासियों का जीवन मैं
मुट्ठी में रखने-वाला।
लेकिन एक अजब-सी दासी
मुझको दास बना बैठी,
अब उसकी मुट्ठी में मेरे
प्राणों का डगमग प्याला।

मैंने सोचा, मैं हूँ क्षत्रिय,
तीर-धनुष रखने-वाला।
कितनों ही को मार गिराया
कितनों को चित कर डाला।
लेकिन एक नजर से छूटा
तीर लगा आकर जब से,
तब से अपना जौहर भूला
बनी शिवाला लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ बनिया,
अनुपम धन-दौलत-वाला।
कभी न बेचा कुछ घाटे में,
सारी ही घर भर डाला।
लेकिन एक सरल गुड़िया ने
यों ही मुझे खरीद लिया,
अब न पता है, कहाँ तिजोरी,
और तिजोरी का ताला।

मैंने सोचा, मैं सन्यासी,
जग भर से बचने-वाला।
सत् की ओर बढ़ा अपने पग
खुद को संत बना डाला।
लेकिन एक सदाचारिन पर
जब से मेरी दृष्टि पड़ी,
तब से मेरे पग बढ़ने का
मार्ग एक बस- लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ फक्कड़,
बिलकुल सूखे दिल-वाला।
घूमे बाग बहुत, पर मुझ पर
फूलों ने न असर डाला।
लेकिन एक लता-सी उसने
भारी मन को हिला दिया,
पत्थर के भीतर भी लहरें
खूब उठाती लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ पागल,
अस्थिर बुद्धि-वचन-वाला।
मेरे अंदर मचता रहता
अनसुलझा गड़बड़झाला।
लेकिन एक चतुर पगली ने
सब पागलपन दूर किया,
मेरे जीवन का संचालन
करती है अब वह बाला।

मैंने सोचा, मैं जादूगर,
चकित सभी को कर डाला।
मेरे करतब देख-देख कर
जग बन जाए मतवाला।
लेकिन एक इशारो-वाली
जादू मुझ पर चला गई,
'प्यार' शिकारी फंदा उसका,
और मंत्र है 'लवशाला'।

मैंने सोचा, मैं अति सुंदर,
मेरे दम पर लवशाला।
रति-जैसी छवि को भी चाहूँ
तो अपनी हो वह बाला।
लेकिन एक सुघड़ जोगन ने
चूर घमंड किया मेरा,
फिरता मैं अब उसके पीछे
हाथों में ले जयमाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ गायक
गीत मधुर गाने-वाला।
मैंने अपनी सुर-लहरी से
सबका हृदय रिझा डाला।
लेकिन एक मधुरवदना की
जैसे ही आवाज सुनी,
बस मैं भूला राग, ताल, सुर,
कंठ बसी अब लवशाला।

मैंने सोचा, मैं प्रतिनिधि कवि,
श्रृंगारी भावों-वाला।
दसियों रूपसियों को मैंने
सब की प्रिया बना डाला।
लेकिन उस कविता जैसी का
जब मुझको श्रृंगार दिखा,
हुई तुरंत बेहोश लेखनी,
बंद हुई यह लवशाला।

डॉक्टर रमेश चंद्र महरोत्रा