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Wednesday, April 15, 2015

नेत्रदान-महादान HANDS बि‍लासपुर

नेत्रदान-महादान 
HANDS (Health And Nature Development Welfare Society) आयोजन
22 मार्च 2015

  • नेत्रदान एक राष्ट्रीय आवश्यकता -
  • भारत में दृष्टिहीनों की संख्या: 1.25 करोड़
  • नेत्ररोपण से दृष्टि पा सकते हैं: 30 लाख
  • प्रति वर्ष 80 लाख मृतकों में से सिर्फ 15 हजार नेत्रदान 
  • नेत्रदान के लिये उम्र एवं धर्म का कोई संबंध नहीं, चश्मेवाले या माेतियाबिंद आॅपरेशन करवा चुके लोग भी सकते हैं नेत्रदान
  • नेत्रदान मृत्यु के 3 से 4 घंटे के अंदर होना चाहिये, असाधारण परिस्थितियों में 6 घंटे तक संभव है
  • नेत्रदान करने की इच्छा व्यक्त करने का बेहतर तरीका है, अपने घर के करीब के नेत्र बैंक में शपथपत्र भरें
  • शपथपत्र भरने पर एक कार्ड आपको दिया जायेगा जिसमें आपका रजिस्ट्रेशन नंबर होगा, इस कार्ड को हमेशा अपने साथ रखें।
'दो चुटकी राख या दो लोगों को आँख', एक अहसास 
कि हमारे अपने तो हमारा साथ छोड़कर चले गए, 
लेकिन उनके एक दान से या हमारी जागरूकता से 
दो जीवित लोग इस दुनिया के रंग देख सकते हैं। 

     
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा
     
श्रीमती उमा महरोत्रा

  मेरे माता-पिता 2014 की जनवरी और दिसंबर में एक-एक करके मेरा साथ छोड़ गए, लेकिन आज 4 लोग ऐसे हैं जो उनकी आंखों से देख पा रहे हैं ये जहां और शायद उनकी दुआएँ मुझे लगातार मिल रही हैं, मुझे ऊर्जा प्रदान कर रही हैं, मेरे परिजनों के जाने के दुख को जरा सा कम कर पा रही हैं। ऐसा अहसास हर व्यक्ति महसूस कर सके, रौशनी हर अंधेरे में जी रहे व्यक्ति को मिल सके, लोगों में ये अहसास जगाने का काम कर रही है, बिलासपुर की HANDS (Health And Nature Development Welfare Society)  संस्था।

15-20 युवा एक साल में बिलासपुर में न के बराबर नेत्रदान करने वाले आंकडे़ को इस स्थिति तक ले आए है कि 29 मार्च को उन्होंने 25 ऐसे परिवारों को सम्मानित किया, जिन्होंने पिछले वर्ष नेत्रदान किया है। छ.ग. के स्वास्थ्य मंत्री माननीय अमर अग्रवाल, कमिश्नर श्री सोनमणि बोरा व महापौर किशोर साहू ने इन नेत्रदान परिवारों को सम्मानित किया। इस अवसर पर नेत्रदान पर आधारित एक लघुफिल्म दिखाई गई व पावर पाइंट प्रेजेन्टेशन से दुर्लभ जानकारियाँ प्रदान भी की गईं। 
अग्रज के कलाकारों की प्रस्‍तुति‍
      अग्रज नाटय दल के कलाकारों ने 3-4 मिनट की छोटी-छोटी प्रस्तुतियां मंच पर पेश की, कुछ ऐसी घटनाएंँ कथाएँ जो नेत्रदान से जुड़ी हुई थीं और लोगों को अंदर तक झकझोर र्गइं। वहाँ उपस्थित लोगों ने नेत्रदान के फार्म भरे और उस अहसास को महसूस किया कि उनके इस दान से कोई और देख पाएगा इस रंगीन दुनियाँ के नजारे।
 

   

HANDS Group, Bilaspur

HANDS (Health And Nature Development Welfare Society) BILASPUR (C.G.)   Abhishek Vidhani 9827900099                                                 Avinash Ahuja 0803194222



     


Sunday, September 9, 2012

बोलते विचार 67 व्यर्थ के झगड़े का इलाज


व्यर्थ के झगड़े का इलाज
आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



एक मोहल्ले की एक सड़क के बीच में एक कम पढ़ी-लिखी निम्न वर्गीय औरत एक साइकिल सवार को रोककरडाँट रही थी कि यदि तुम्हारी साइकिल से मेरे टककर लग जाती तो मेरे चोट लग जाती। साइकिल वाला जवाब दे रहा था कि न तो तुम्हारे चोट लगी है और न मेरी साइकिल ने तुम्हे छुआ ही है। मैं तो एक फुट की दूरी से  साइकिल निकाल रहा था। औरत बिगड़कर कहने लगी कि नहीं, तुम्हें साइकिल को और ज्यादा दूरी से  निकालना था, तुम्हारी गलती से मेरे चोट लग सकती थी। अगर लग जाती तो ? औरत के तेवर देखकर लग रहाथा कि वह साइकिल वाले को वहाँ से जल्दी नहीं जाने देगी और उसे खरी-खोटी सुनाती ही रहेगी।

साइकिल वाला जानता था कि साइकिल चलाने में उसने लेशमात्र भी गलती नहीं की थी, उलटे उसने औरत को सड़क के बीचों बीच चलते देखकर उससे बचने में विशेष सावधानी बरती थी। फिर भी उसने तत्काल गलती मान ली और बोला, ‘माँ जी ! मुझे एक बार माफ कर दो बस। आगे से ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।औरत ने अपनी जीत की खुशी में साइकिल वाले को मुक्त कर दिया।

जिंदगी में जाने कितने ऐसे अवसर आते हैं, जब हम दूसरे की नासमझी या गलती के कारण परेशानी में फँस जाते हैं। उपर्युक्त प्रकरण में यदि साइकिल वाला बहस को बढ़ाता रहता तो बात बिगड़ती ही चली जाती। उसका माफी माँगकर बखेड़े को जल्दी से निबट डालने का कदम बहुत समझदारी का था। ऐसा करने से उसकी जेब से कुछ नहीं गया और उसने एक नासमझ के क्रोध को जीत लिया। यदि वह अपनी सफाई दे देकर औरत के क्रोध को बढ़ाता जाता और अपने अहम् के नाम पर स्वयं भी अधिकाधिक क्रुद्ध होता जाता तो अपना ही नुकसान करता।

निष्कर्षतः किसी व्यर्थ के झगड़े का इलाज स्वयं को गलत न सिद्ध करने के लिए झगड़ा बढ़ाना नहीं है, उसका इलाज झगड़ा करने वाले के हाथ जोड़ लेना है।

Monday, September 3, 2012

बोलते विचार 66 वैयक्तिक लाभ और सामाजिक लाभ



बोलते विचार 66
वैयक्तिक लाभ और सामाजिक लाभ
 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



टी. वी. बिगड़ गया था। दुकानदार को फोन कर दिया, उसका आदमी घर आया और सुधारकर चला गया। पैसे लेकर रसीद  दे गया, सब बढि़या। एक बार वॉशिंग मशीन बिगड़ गई। उसके दुकानदार को भी उसी प्रकार फोन किया। उसने मना करते हुए कहा कि शिकायत लेकर स्वयं दुकान तक पहुँचना जरूरी है। पहले समझ में नहीं आया कि क्यों, पर वहाँ पहुँचने पर पता चला कि निर्धारित न्यूनतम राशि (दुकान के मैकेनिक के पारिश्रमि‍क और आने-जाने के खर्च को मिलाकर) जमा करना जरूरी है। ठीक है, राशि जमा कर दी। पर वहाँ यह कहे बिना नहीं रहा गया कि यह तो हम घर पर भी दे देते। इस पर वे बोले कि हम धोखा खा चुके हैं। एक संभ्रांत माने जाने वाले सज्जन ने घर बुलाया था। उनके यहाँ का काम करने के बाद जब बिल दिया तो वे बिगडने-झगड़ने लगे कि इतने ज़रा से काम के लिए इतने रूपए नहीं देंगे। तब से हमने नियम बना लिया कि बिना अग्रिम राशि  जमा कराए किसी के भी यहाँ नहीं जाएँगे।

आशय स्पष्ट है कि करे एक, भरें सब। समाज के कुछ अविवेकी और बदनीयत लोगों के कारण दूसरों को बिना बात के परेशानी-उठानी पड़ती है; एक के अविश्वसनीय व्यवहार के कारण अन्यों पर भी विश्वास करने में दुविधा होने लगती है। उपर्युक्त प्रकरण में दुकानदार को दोष देना फिजूल है, क्योंकि वह पहले से यह कभी नहीं जान पाएगा कि किस क्रेता का व्यवहार काम निकल जाने के बाद कैसा रहेगा। जो क्रेता गलत व्यवहार करता है, वह भविष्य के लिए दुकानदार विशेष से अपने ही संबंधों को बिगाड़ने वाला नहीं, दूसरों के लिए भी सामाजिक विद्रूपताएँ सामने खड़ी करने वाला अपराधी बन जाता है। वह केवल अपने छोटे लाभ के बारे में सोचता है, बड़े लाभ के बारे में नहीं सोच पाता। (यदि उन संभ्रांत क्रेता महोदय को मशीन की सुधरवाई महँगी ही लगती थी तो उन्हें मैकेनिक को अपने घर बुलाने के पहले दुकानदार से फोन पर ही रेट आदि की बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए थी।)

सदा याद रखी जाने वाली बात है कि थोड़े से पैसों की ‘अस्वीकृत बचत’ के वैयक्तिक लाभ की तुलना में अच्छे संबंधों के स्थायी सामाजिक लाभ का महत्व बहुत अधिक है।

Sunday, September 2, 2012

Bolte Shabd 98 'अच्‍छा' व 'भला'





बोलते शब्‍द 98
आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा

स्‍वर
संज्ञा टंडन



180. 'अच्‍छा' व 'भला'






Production - Libra Media Group, India

Friday, August 31, 2012

Bolte Shabd 97 'अख़बार' व 'गज़ट'





बोलते शब्‍द 97


आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा

स्‍वर
संज्ञा टंडन


179. 'अख़बार' व 'गज़ट'








Production-libra media group

Wednesday, August 29, 2012

Bolte Vichar 65 उधार लेने और देने से बचिए


बोलते विचार 65
उधार लेने और देने से बचिए

 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


प्रोफेसर साहब ने किसी-किसी  दुकान पर लिखे हुए वाक्य उधार प्रेम की  कैंची हैसे भारी शिक्षा ली थी। वे अपने प्रेम संबंध किसी से भी खराब नहीं करना चाहते थे, इसलिए वे न तो किसी से रूपए उधार लेते थे और न किसी को उधार देते थे दूसरी ओेर, वे उधार माँगने वाले छोटे-मोटे लोगों की थोड़े   बहुत रूपए-पैसों से मदद जरूर करते थे; लेकिन उनसे यह कहे हुए कि ये   रूपए वापस नहीं लूँगा इसका मुख्य कारण वे यह बताते थे कि ऐसा करने  से उनके मन पर यह बोझ और तनाव बिलकुल नहीं रह जाता था कि वह व्यक्ति ऋणस्वरूप लिये गए रूपए अपनी दी हुई ज़बान के  अनुसार समय पर या कभी वापस करेगा या नहीं। हमें ऐसी स्थिति कई बार झेलनी पड़ती है कि हमने तो अपनी शराफत में किसी जरूरतमंद को उसकी मदद के    नाम पर रूपए उधार तत्क्षण दे दिए कि वह बेचारा मुश्किल में है और दूसरेउसने रूपए माँगते समय हमसे दुनिया भर की इन्सानियत दिखाते हुए    यह  वचन भी भरा कि वह वे रूपए अमुक तिथि को जरूर वापस कर देगा    (यहाँ ब्याज के धंधे और लिखत- पढ़त की बात बिल्कुल नहीं है)। पर बाद में उन रूपयों का वापस मिलनादर्जनों बार टलती हुई अनिश्चिततामें बदलता  चला गया। प्रोफेसर साहब कहा करते थे कि इस प्रकार वह झूठा और बेईमान ऋणी हमें बेवकूफ बनाने में सफल हो जाता है। वे ऐसे मामलों में    अपना भारी सा अहसान ऋण मांगने वाले पर पटक कर शुरू में ही आगामी   दुविधा से मुक्त हो जाते थे। और यदि उनसे कोई यह पूछता कि वे रूपए तो क्या तो वे उत्तर देते -
रहिमन के नर मर चुके जे कहुँ माँगन नाहिं।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि।।

प्रोफेसर साहब का दृष्टिकोण मानवतावादी था; पर एक बात वे यह भी  कहते थे, जो रहीम ने नहीं कही थी, कि उधार लेकर वापस करने का वादा  करके उसे न चुकाने वाले कृतघ्न आदमी से एक भिखारी बहुत ज्यादा  ईमानदार होता है, क्योंकि यह विश्वासघात नहीं करता। केवल अपना  स्वाभिमान खोता है।


Production-libra media group, bilaspur,india

Friday, August 24, 2012

Bolte VIchar 64 नि‍र्णय के पूर्व


बोलते विचार 64

नि‍र्णय के पूर्व

 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 

महेश अपने भाई और पिता से जमीन-जायदाद संबंधी मुकदमा लड़ रहे थे, जिस सिलसिले में उन्हें अपने गाँव से अपनी बड़ी बहन के नगर कई बार जाना हुआ करता था। स्वाभाविक था कि वे बहन के यहाँ ठहर जाया करते थे। वहाँ वे जब-तब पिता के विरूद्ध विष उगलते रहते थे, जिसके प्रभाव से बहन पिता को इतना बुरा समझने लगी थी कि उसका मन उनके पास जाने का भी नहीं होता था। कुछ समय बाद जब एक बार उसका किसी विशेष अवसर पर गाँव जाना हुआ तो पिता ने उसे महेश के विरूद्ध बीसियों बातें बता डालीं, जिनका उस पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने महेश को आगे अपने घर पर ठहरने को क्या, आने तक को मना कर दिया।

यह सच्ची घटना सिर्फ यह सोचकर लिखी गई है कि किसी बात पर विश्वास केवल एक पक्ष को सुनकर करना उचित नहीं है - विशेषकर तब, जब बात में किसी व्यक्ति की बुराई-ही-बुराई हो। किसी की लगातार और हमेशा सिर्फ बुराई करने वाला व्यक्ति सामान्यतया ‘उस किसी’ के प्रति व्यक्तिगत विद्वेष से भरा हुआ होता है। जब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप पर आरोप लगाते जा रहे हों तब सच्चाई को खोज निकालना आसान नहीं होता। कचहरियों की जरूरत इसीलिए पड़ती है।

यदि आप किसी ऐसे मामले में दो पक्षों की बीच फँस जाएँ तो ‘किसी एक की’ अच्छी-से-अच्छी या बुरी-से-बुरी बात को भी सुनकर अपना निर्णय कभी न दें।

Wednesday, August 8, 2012

bolte vichar 63 संन्‍यास के बि‍ना भी.......


बोलते विचार 63

संन्‍यास के बि‍ना भी.......




 आलेख व स्‍वर 
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


अच्छा बनने की चाह तो बहुतों में होती है और उसके लिए कोशिश भी बहुत से लोग करते हैं, पर अधि‍क-से-अधिक लोगों के लिए अच्छा बनकर दिखाने वाले व्यक्ति विरले ही होते हैं। इसका कारण यह है कि अच्छे-बुरे व्यक्ति हमारे अच्छा या बुरा होने का मूल्यांकन करते हैं, उनकी संख्या का भी कोई अंत नहीं है और अच्छाइयों तथा बुराइयों की भी कोई सीमा नहीं है।

अच्छा होने का संबंध मनुष्य के भीतर से भी है और बाहर से भी। बाहर की अपेक्षा भीतर से अच्छा होने का महत्व बहुत अधिक है ; क्योंकि स्वयं को केवल बाहर से अच्छा दिखाने वाले व्यक्ति ढोंगी होते हैं। उनकी पोल आगे-पीछे जरूर खुल जाती हैं। दूसरी ओर, केवल भीतर से अच्छे देर-सबेर दूसरों की नज़रों में अपनी अपेक्षित पहचान और इज्ज़त बना ही लेते हैं। यदि वे बाहर से भी अच्छे हुए, तब सोने में सुहागा है। उन अच्छों की सुगंध फैलते देर नहीं लगती।

उपर्युक्त उच्च अवस्था संत और संन्यासी बनकर प्राप्त करना अधिक सरल है, क्योंकि उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं होतीं और उन्हें सामाजिक आवश्यकताओं और प्रतिद्वंद्विताओं का सामना कम करना पड़ता है। अन्य लोगों को एक-दूसरे की इच्छाओं के पारस्परिक टकराव और बहुत व्यापी ईर्ष्‍या के कारण अच्छा बनने और बना रहने के लिये विकट संघर्ष करना पड़ता है। संतों और संन्यासियों के निजी जीवन की तुलना में सामान्य आदमियों के जीवन में विरोधों और शत्रुताओं के अवसर अधिक आते हैं। ऐसी स्थिति में भी जो व्यक्ति नैतिक मूल्यों पर खरे उतरते हैं, वे वस्तुतः संतों और संन्यासियों से भी अधिक बड़े हैं और मानव मात्र के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय हैं। 

गांधीजी ने संसार की कर्मस्थली से बिना अलग हुए यह सिद्ध कर दिखाया कि आदमी सांसारिक गतिविधियों से विरक्‍त न रहकर भी अधिकाधिक लोगों के लिए अधिकाधिक अच्छा बन सकता है। यही बात गांधीजी के पदचिन्हों पर ईमानदारी से चलने वालों पर लागू है। निष्कर्ष यह है कि अच्छा बनने के लिए संन्यास लेना जरूरी नहीं है, शादी न करना जरूरी नहीं है, चौबीसों घंटे भजन-प्रवचन करना-सुनना जरूरी नहीं है।

Production-Libra Media Group

Monday, August 6, 2012

Bolte Shabd 95 - 'अंकुश' व 'नि‍यंत्रण'




बोलते शब्‍द 95


आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा

स्‍वर
संज्ञा टंडन


              177. 'अंकुश' व 'नि‍यंत्रण'



Production - Libra Media Group, Bilaspur, India

Friday, August 3, 2012

Bolte Shabd 94 'हुए' व 'लिए'





बोलते शब्‍द 94


आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा


स्‍वर
संज्ञा टंडन


176. 'हुए' व 'लिए'





Production - Libra Media Group

Saturday, July 28, 2012

Bolte Vichar 61 अंतिम तिथि और अनुशासन


बोलते विचार 61

अंतिम तिथि और अनुशासन




आलेख- डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 
स्‍वर - संज्ञा टंडन




किसी भी तरह के आवेदन आदि की पहुँच के लिए ‘अंतिम तिथि’ क्यों दी जाती है ? आप हँस सकते हैं कि वह भी कोई सवाल है। क्योंकि इसका जवाब हर आदमी जानता है। ठीक है, अंतिम तिथि इसलिए दी जाती है कि उसके बाद प्राप्त होने वाले आवेदनों पर विचार नहीं किया जायेगा। इसी प्रकार यदि किसी प्रवेश या परीक्षा या नौकरी के लिए आवेदनकर्ता की उम्र दी गई तिथि तक निर्धारित किए गए वर्षों से अधिक नहीं होनी चाहिए तो उस तिथि तक उम्र एक दिन भी अधिक हो जाने से आवेदनकर्ता प्रवेश या परीक्षा या नौकरी के लिए अपात्र हो जाता है, यह भी ठीक है।

लेकिन कभी-कभी नासमझ लोग कुतर्क और जिद करने लगते हैं कि एक-दो दिनों से कोई फर्क नहीं पड़ता हे। वे गलत ही नहीं, भयंकर रूप से गलत होते हैं; क्योंकि वे अपने स्वार्थ के लिए समूची व्यवस्था में छेद करने वाले होते हैं।

ऐसे मामलों में नियम भंग करने की कोशिश करने वालों के लिए शिथिलता बरतना उनकी सड़ी आदत को बढ़ावा देना और नियम से चलने वालों के साथ अन्याय करना है। पक्षपात किसी के भी प्रति किस किया गया हो, वह पक्षपात करने वाले की कमजोरी और ओछापन ही होता है। यदि, मान लिया, आपने किसी एक को अंतिम तिथि के बाद दो दिनों की छूट दे दी, तो अंतिम तिथि उन दो दिनों के बाद की हो गई और दूसरे लोगों को उस तिथि के आगे के दो दिनों की छूट लेने का हक हो गया। यदि आप परीक्षा भवन में घुसने के लिए दस मिनट विलंब से आने वाले परीक्षार्थी को अनुमति दे देते हैं तो बारह मिनट विलंब से आने वाले को क्यों नहीं देंगे ? यदि आप निर्धारित अधिकतम वर्षों से चार दिन अधिक उम्र वाले व्यक्ति का आवेदन स्वीकार कर लेते हैं तो पाँच दिन अधिक उम्र वाले का आवेदन स्वीकार क्यों नहीं करेंगे ? यदि आप उसका भी आवेदन स्वीकार कर लेते हैं तो छह दिन अधिक उम्रवाले का आवेदन स्वीकार क्यों नहीं करेंगे? इस तरह छूट को बढ़ाने की सीमा के लिए कोई भी तर्क संगत नहीं हो सकता।

अंतिम तिथि और निर्धारित उम्र आदि से संबंधित शर्त पूरी न करने वाला व्यक्ति चाहे कितने भी सही-गलत कारण बताए, गलती सिर्फ उसकी होती है। उसकी व्यक्तिगत गलती के कारण आप उससे बहुत ज्यादा बड़ी सामाजिक गलती मत कीजिए। ऐसी स्थिति में सख्ती बरतना ही एक मात्र सही रास्ता है, वरना नियम और अनुशासन का कोई अर्थ नहीं है।

Production-Libra Media Group, Bilaspur, India

Friday, July 27, 2012

Bolte Shabd 93 'हस्ताक्षर' व 'सामग्री'



बोलते शब्‍द 93


आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा


स्‍वर
संज्ञा टंडन


175. 'हस्ताक्षर' व 'सामग्री'





Wednesday, July 25, 2012

Bolte Vichar 60 आदमी सिर्फ आदमी है


बोलते विचार 60

आदमी सिर्फ आदमी आदमी है


आलेख व स्‍वर 

डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 


बात दसों साल पहले की है। मेरी नानी पास के नगर से हमारे नगर, हमारे घर आई हुई थीं। उन्होंने कुछ पैसे देकर मुझे जलेबियाँ खरीदकर लाने के लिए बाजार भेजा। मेरे साथ मेरी छोटी बहन भी थी। हम सड़क पर पड़ने वाली पहली अच्छी हलवाई की दुकान से जलेबियाँ खरीदकर घर ले आए। वह दुकान मुसलमान की थी, जबकि हमारी नानी तरह-तरह के छुआछूत मानने वाली पुरातन पंथी हिन्दू थीं। नानी ने जलेबियाँ खूब प्रेम से खाई और उनकी तारीफ भी की। उस दिन की बात खत्म।

अगले दिन छोटी बहन ने बातों-बात में नानी को बता दिया कि हम जलेबियाँ एक मुसलमान हलवाई की दुकान से लाए थे। बस, फिर क्या था। नानी ने कोहराम मचा दिया। एक सौ एक बार कुल्ला किया। साथ ही उस दिन का उपवास किया और एक घंटा अतिरिक्त पूजा भी की।

जाहिर है कि यदि नानी को पता नहीं चलता कि जलेबियाँ कहाँ से खरीदी गई थीं, तब उनकी बुद्धि पूर्ववत् सही रहती। मतलब साफ है कि न तो जलेबियों में कोई खराबी थी और न हलवाई के मुसलमान होने में। जो कुछ था, नानी का अविवेक था।

हममें से अनेक लोग ऐसी न जाने कितनी फालतू बातों से बहककर सामाजिक प्रदूषण को बढ़ावा देते रहते हें। कमाल की बात यह है कि वही नानी जब दो दिन बाद अपने नगर वापस आईं तब ट्रेन के भीड़ भरे डिब्बे में चढ़ते समय जगह पाने के लिए जाति-धर्म से संबंधित सारी छुआछूत भूल गईं। उनके एक ओर मुसलिम महिला बैठी और दूसरी ओर दलित वर्ग की महिला।

सच्चाई यह है कि आदमी प्राकृतिक रूप से सिर्फ आदमी है। वह रंग-रूप और आकार- प्रकार के हिसाब से चाहे कितने ही वर्गों में बाँटा जा सके, उसकी मूल संरचना उसे पशु-पक्षियों से भिन्न सिर्फ ‘एक’ सिद्ध करती है। हम किसी नवजात शिशु को देखकर केवल यह बता सकते हैं कि वह ‘आदमी का’ बच्चा है, यह नहीं बता सकते कि वह किसी जाति और धर्म का बच्चा है। यदि हमें कोई न बताए तो यह बात उसके जीवनपर्यंत लागू रहेगी।

जब आदमी-आदमी के बीच जाति-धर्म का अंतर आरोपित अंतर है और इसके विपरीत मानवता सबके भीतर की मूल और स्थायी वस्तु है तो जाति-धर्म की तुलना में मानवता का स्थान अधिक ऊँचा माना जाना जरूरी है। यदि हमें किसी आदमी और उसकी चीजों से परहेज करना ही है तो उसके जाति-धर्म आदि को देखकर नहीं, उसके निजी ओछेपन और उसकी सड़ी-बुसी चीजों को देखकर करें।


प्रोडक्‍शन- लिब्रा मीडिया ग्रुप, बिलासपुर, भारत

Tuesday, July 24, 2012

Bolte Shabd 92 'हर' व 'हरेक'




बोलते शब्‍द 92


आलेख
डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा
स्‍वर
संज्ञा टंडन


174. 'हर' व 'हरेक'








Production-Libra Media, Bilaspur, India

Monday, July 23, 2012

Bolte Vichar 59 Agantuk ke prati vyavhar


बोलते विचार 59

आगन्‍तुक के प्रति व्‍यवहार




 आलेख व स्‍वर 

डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा 



श्रीमान् ‘क’ के घर जाकर आप जब-जब दरवाजे पर लगी घंटी बजाते हैं तब-तब भीतर से कोई व्यक्ति प्रायः बहुत जल्दी बाहर निकल आता है; जबकि श्रीमान् ‘ख’ के यहाँ जाकर घंटी बजाने पर भीतर से किसी को निकलने में हमेशा काफी समय लग जाता है। केवल इतनी सी बात से आप निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीमान् ‘क’ सुसंस्कृत आदमी है, जब श्रीमान् ‘ख’ कुल मिलाकर अच्छे आदमी नहीं है - ‘क’ में दूसरों के बारे में भी सोच पाने की क्षमता है, जबकि ‘ख’ केवल अपने बारे में सोचना जानते हैं

यदि ‘क’ घर के भीतर किसी जरूरी काम में व्यस्त होंगे, तब भी वे कुछ क्षणों के लिए बाहर आकर या किसी को भेज कर वस्तुस्थिति से अवगत करा देंगे। वे उसे प्रतीक्षा करने के लिए सम्मान पूर्वक बैठा तो सकते ही हैं, उसे उस समय समय न दे पाने की स्थिति में उससे क्षमा भी माँग सकते हैं। इसके विपरीत, ‘ख’ महोदय आगंतुक के देर तक बाहर सूखते रहने की भी परवाह नहीं करते और यह भी नहीं सोच पाते कि वे उसका अपमान कर रहे हैं

‘क’ अपने को ‘समाज का अंग’ मानते हुए यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आगंतुक कौन हैं और क्यों आया होगा। ‘ख’ अपने स्वयंवादी होने का सबूत देते हुए यह सोचते हैं कि बाहर जो भी आया होगा, अपनी ही गरज से आया होगा।

अपने घर के भीतर काम सबको रहते हैं। (आराम करना भी एक काम है) दूसरी ओर, यह भी सच है कि कभी-कभी घर की घंटी बहुत अनचाहे वक्त पर बज उठती है। पर हम इतनी सज्जनता तो दिखा ही सकते हैं दरवाजा खोलकर आगंतुक से सिर्फ एक मीठा बोल बोल दें। हम यह पक्का जान लें कि यदि हमारे घर का दरवाजा खुलने में हमेशा, अपपेक्षित देरी होती है तो समाज में हमारी छवि नीची होती है - लोग हमें स्वार्थी, अहंकारी, घरलिसा और न जाने क्या-क्या मानने लगते हैं। हो सकता है कि हममें से कोई रट्ठ इसका जवाब यह दे डाले कि भाड़ में जाएँ ऐसा मानने वाले,  हमें किसी से क्या लेना-देना। लेकिन इसके बदले हमें यह सुनने को मिल सकता है कि हमें भी समाज से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए और जंगल का रास्ता नाप लेना चाहिये।

हमारे परिचित एक साहब, बल्कि महासाहब, जब तक सेवारत रहे तब तक सबके साथ ऐसा ही रवैया अपनाते रहे, सेवानिवृत्त होने के बाद उनके यहाँ कोई कुत्ता भी मूतने नहीं जाता (अभद्र प्रयोग के लिए क्षमा करेंगे)

Production- Libra Media, Bilaspur, India